13.7.12

जयपुर का राज-प्रासाद
“बान्दरवाल का दरवाजा”
दुदुम्भी-पोल
जलेब-चौक
उदय-पोल
दीवान-ऐ-आम
सवाई मानसिंह म्यूजियम
सर्वतोभद्र — दीवान-ऐ-ख़ास
मुबारक महल
चन्द्रमहल
जनानी ड्योढ़ी
जंतर-मंतर वेधशाला
हवामहल
जयनिवास उद्यान
गोविंददेवजी का मंदिर
ताल कटोरा
बादल महल
त्रिपोलिया
ईसरलाट — सरगासूली 

जयपुर शहर जिस माप, पैमाने और ढर्रे पर सवाई जयसिंह ने बसाया वह आज भी सबका मन मोह लेता है.  इसकी सबसे बड़ी मिसाल जयपुर का नगर-प्रासाद या राजमहल है जो नौ चौकडियों के इस शहर के बीचों-बीच स्थित है. परकोटे से घिरे शहर का कुल सातवाँ हिस्सा इस महल की सरहद में आता है.
जयपुर राजमहल का यह क्षेत्र एक तरह से शहर के अन्दर शहर है. राजा-रानियों की नगरी, जिसमें अनेक भव्य महल, दर्जनों मंदिर,लम्बे चौड़े बाग़ बगीचे, आवासीय घर भरें है.
जयपुर का यह नगर-प्रसाद वस्तुतः नगर-कोट है. सामरिक स्थापत्य में आठ तरह के किले माने गए है. इनमें नगर कोट वह है जो धराधार तो होता ही है, जनसंकुल नगर से भी घिरा होता है. जब जयपुर शहर की आयोजना हो रही थी तो राजा के निवास के लिए नगर का यह मध्यवर्ती क्षेत्र सर्वथा उपयुक्त माना गया. क्योंकि उत्तर दिशा में नाहरगढ़ और गणेश गढ़ की पहाड़ियां व ताल कटोरा और राजामल के तालाब से, जिनमें मगरमच्छ भी खूब थे, सुरक्षित था. दक्षिण में मोदीखाना और विश्वेश्वर जी की चौकडियाँ, पश्चिम में पुरानी बस्ती और उसके सामने तोपखाना की चौकडियाँ रहनी थी. और पूर्व में गलताजी व लाल डूंगरी की पहाड़ियों से प्राकृतिक सुरक्षा प्राप्त थी.

“बान्दरवाल का दरवाजा”

जयपुर के इस भव्य राजमहल में प्रवेश का परम्परागत प्रवेश द्वार है सिरह ड्योढ़ी का पूर्व की ओर देखता दरवाजा जिसे “बान्दरवाल का दरवाजा”  भी कहतें है.  इस पोल से राजाओं के आवास चन्द्रमहल तक पहुँचने के लिए थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बने हुए दरवाजों या “पोळो” की श्रंखला में से होकर निकलना होता था. इस सारे रास्तें में कदम कदम पर राजसी वैभव, दरबारी भव्यता की प्रतीति होती है.
बान्दरवाल के दरवाजें में प्रवीश करतें ही दायीं तरफ दो दुमंजिले “नोले” (गैरेज) हैं, जिनमें ऐसे ‘रथ’ या गाड़ियाँ बंद है जो अपने आप में पूरी की पूरी हवेली है. ऐसा रथ जो दो-दो हाथियों को जोतकर खींचा जाता था, हाथियों के इस रथ को “इन्द्र-विमान” कहतें है.
इन्द्र-विमान
दुदुम्भी-पोल
यहाँ से जलेब-चौक में दुदुम्भी-पोल या नक्कारखाने के दरवाजें से होकर प्रवेश किया जाता है. एक स्थापत्य-कला मर्मज्ञ का कहना है की दुदुम्भी-पोल भारत के सर्वोत्तम दरवाजों में से एक है. राजतंत्र के जमाने में यहाँ सुबह-शाम नौबत बजती थी .
दुदुम्भी-पोल (नक्कारखाना)
दरवाजा क्या है एक हवेली है जो पहले रंगों की सजावट से भरा था. सरमिर्जा इस्माइल के जमाने में इस पर एक ही सस्ता रामराज का पीला रंग पोत दिया गया जिससे इसकी पुरानी शोभा तो जाती रही, लेकिन इमारती खूबियाँ आज भी मुंह बोलती है.
जलेब-चौक
अरे नहीं जलेबी-चौक नहीं, जलेब कहिये. जलेब का आशय रक्षा-डाल से है और जलेब-चौक वह विशाल चौकोर चौक है जिसमें सिरह ड्योढ़ी या मर्दानी ड्योढ़ी से आजीविका कमाने वाले शागिर्द-पेशा लोग रहते थे और दरबार या राजा की सवारी का सारा ताम-झाम जुटाते थे. जलेब चौक के सामने उदय-पोल  से सिरह ड्योढ़ी या ख़ास महल को जाने वाला रास्ता है.
उदय-पोल
पलस्तर पर चितराम (चित्रकारी) या रंगीन बेलबूटों के काम पर लोई घिसाई से जैसा चिकनापन इस शहर की पुरानी इमारतों में लायी जाती थी, उसका यह दरवाजा बेहतरीन नमूना है. 
उदयपोल
यहाँ से दाहिनी ओर घुम्तें ही विजय-पोल है इसके बाद एक बड़ा चौक, यहाँ से बायीं ओर घुमने पर जयपोल है और उसके आगे फिर एक छोटा चौक और गणपतिपोल, जो उस विशाल चौक की आड़ बना हुआ है जिसमें “दीवाने-आम” है.
इस तरह बंदरवाल दरवाजे से यहाँ तक छ: “पोल” पार करने पर “दीवाने-आम” और सांतवीं अम्बापोल पार करने पर “दीवाने-ख़ास” या “सर्वतोभद्र” आता है. दीवान-ऐ-आम
दीवान-ऐ-आम एक विशाल सभा भवन या दरबार हॉल है जो एक चबूतरे या ऊँची कुर्सी पर बना है. यह तीन तरफ से खुला और बरामदों से घिरा है, जिनकी कामदार किनारों वाली मेहराबें संगमरमर के शुण्डाकार स्थम्भो की दोहरी कतारों से उठी है. मेहराबों और छत में रंगों और सोने के पानी के काम से जैसे डिजाईन बनाए गए है वह दुर्लभतम है .इस बुलंद इमारत की ऊँची छत में जो विशाल झाड फानूस लटक रहे है, जब रोशन हो  जातें है तो सब-कुछ स्वप्न-लोक सा लगने लगता है.
जयपुर के आखिरी राजा सवाई मानसिंह द्वितीय (1992-1970 ई.) ने  इसी दीवाने-आम में 16081 वर्ग मील में फ़ैली और चौबीस लाख की आबादी वाली जयपुर रियासत को राजस्थान के राज-प्रमुख की शपथ लेकर इतिहास के गर्भ में विलीन होते देखा था. 30 मार्च, 1949 के दिन दीवाने-आम में जो आख़री दरबार हुआ था वह उस सारे इलाके की किस्मत बदलने वाला था जिसे अब राजस्थान कहते हैं . जिस भवन में कोई भी हिंदुस्थानी पगड़ी बांधे बिना प्रवेश नहीं पाता था, उसमें सोने के सिंहासन पर भारत के लौह-पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल “उघाड़े-माथे”-नंगे सिर- विराजमान थे. जर्क-बर्क साफा बांधे सवाई मानसिंह और उनके साथ दूसरे राजा तो अपने राज-पाट ख़ुशी-ख़ुशी छोड़ रहे थे, लेकिन सफ़ेद टोपी वाले –जो भारत का राज संभालने जा रहे थे– आगे बैठने के इंतजाम को लेकर ही आपस में झगड़ने लगे थे और कुछ तो “वॉक-आउट” भी कर गए थे
 
जयपुर रियासत का राजस्थान में विलय. 30 मार्च को सरदार वल्लभ भाई पटेल महाराजा सवाई मानसिंह को राजप्रमुख की शपथ ग्रहण कराते हुए
इसी दीवाने-आम में अब सवाई मानसिंह म्यूजियम है. महाराजा सवाई मानसिंह ने पोथिखाना और सिलेह्खाना से कुछ चीजें चुनकर यह संग्राहलय स्थापित किया था.
संग्राहलय में पोथिखाना की कुल 93 पांडुलिपियाँ प्रदर्शित की गयी है और इनके अलावा बीस पांडुलिपियाँ ऐसी है जिन्हें “कलात्मक” वस्तुओं में गिना जाता है. क्योंकि हस्तलेख और चित्रों, दोनों ही द्रष्टियों से यह महत्वपूर्ण और मूल्यवान है.
आमेर-जयपुर  शैली के उत्कृष्ट चित्रों के नमूने जो रागमाला, भागवत, देवी महातम्य आदि ग्रंथों को सचित्र बनाने के लिए तैयार किये गए थे, प्रदर्शित हैं.

मुग़ल काल के बेहतरीन कालीन-गलीचे, सोने-चांदी का हाथी का हौदा, तख्ते रवां , अम्बाबादी,पालकी और रानियों के बैठने की छोटी गाडी, जैसे सवारी के कुछ साधन प्रदर्शित है.
 
सिलेह्खाने के अस्त्र-शस्त्र इस संग्राहलय का दूसरा भाग है जो आगे  चलकर मुबारक महल के चौक में एक दूसरे हिस्से में प्रदर्शित है. यहाँ तरह तरह की तलवारें. किसी की मूठ मीनाकारी की है तो किसी में जवाहरात जड़ें हैं. तरह तरह की बंदूकें, ढाल,गुर्ज,बाघनख,जिरह-बख्तर और ना जाने क्या-क्या हथियार ! अकबर के सेनापति आमेर शशक राजा मानसिंह प्रथम का खांडा (तलवार) देखकर अचम्भा होता है की इसे उठाने वाला किस डील-डौल का रहा होगा.
संग्राहलय का तीसरा विभाग एक प्रकार से वस्त्र प्रदर्शनी है. यह मुबारक महल में ऊपर है.
जयपुर दर्शन श्रंखला में जयपुर के राज-प्रासाद की सैर अभी शुरू ही हुयी है. बहुत कुछ बाकी है अभी.
फिर इसके बाद चार दिवारी से बाहर निकल कर नए जयपुर और आस-पास के स्थानों में घूमेंगे जी .
बड़ी मुश्किल से यह पोस्ट लग पायी है, लगातार संपर्क भी बना नहीं रह पायेगा शायद ………पर आप तो जयपुर दर्शन का मज़ा लीजिये

सरदार पटेल की मेहनत बेकार जायेगी


भारत की स्वतंत्रता के पहले भारत में लगभग 565 छोटी-छोटी रियासतें/सूबे अस्तित्व में थे, जिसके अपने फायदे कम नुकसान ज्यादा थे। आजादी के समय भी छोटी-छोटी रियासतों एवं सूबों ने अंग्रेज के खिलाफ अपने-अपने तरह से खिलाफत की तो कुछ ने साथ दिया। स्वतंत्रता के पश्चात् सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपने फौलादी इरादों से 1948 में भारत में निजाम की रियासत का अंत कर दिया। इस वक्त राज्यों की कुल संख्या 14 थी। सन् 1950 में भाषाई आधार पर राज्यों का गठन किया गया। कन्नड्, मराठी एवं मलयाली के विरोध के फलस्वरूप सन् 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ। सभी राज्य प्राकृतिक तौर पर अपनी-अपनी तरह की संपदा से सम्पन्न थे, उसके बावजूद भी राजनीति के चलते समय-समय पर नदी, जल को लेकर कर्नाटक एवं तमिलनाडु में टकराहट होती रही है, फिर भी समस्या काबू में थी। लेकिन, जब से राजनीति में राजनेताओं के स्वार्थों के टकराहट एवं महत्वाकांक्षा बढ़ी है तब से नए एवं छोटे राज्यों के गठन का तर्क देने में जुट गए और बड़े राज्यों के नुकसान अपने हितों को साधते हुए गिनाने लगे। मसलन क्षेत्र बड़ा होने से शासन को दूर-दराज के क्षेत्रों की प्रगति पर अच्छे से ध्यान देना संभव नहीं होता है, इसके लिए बड़े-बड़े राज्यों को छोटे-छोटे राज्यों में बांटा जाए। इस बात को लेकर राजनेताओं ने जनता की बलि चढाकर अलग-अलग आंदोलन चलाए और अंत में बिल्ली के भाग से छींका टूटा अर्थात् सन् 2000 में म.प्र., उ.प्र. एवं बिहार को तोड क्रमशः 1 नवंबर को छत्तीसगढ़,9 नवंबर को उत्तरांचल एवं 15 नवंबर को झारखण्ड राज्यों का निर्माण कराया। हमारे तथाकथित नेताओं का स्वार्थ यहीं तक नहीं रूका उनकी महत्वाकांक्षाओं को भी पर लगे और अब आंध्र में तेलंगाना की मांग हठयोग पर कुत्सित प्रयास किया गया। इसी से उत्साहित नेता बिरादरी के अन्य महत्वाकांक्षी उप्र. मप्र., बिहार, महाराष्ट्र में पुनः पुनर्गठन के तहत् छोटे-छोटे राज्यों के बनाने की मांग और बलवती होती जा रही है। इससे कहीं न कहीं हम पटेल के सपनों को न केवल तोड़ रहे है बल्कि अपने स्वार्थ के लिए विभाजन कर ताने-बाने को भी बिखरा रहे हैं। अब वह दिन दूर नहीं जब हमारे नेता जाति, धर्म, भाषा (पहले ही बन चुके हैं) आधारित राज्यों की कहीं मांग न करने लग जाएं और इस बाबत् वे ढेरों तर्क इसके संबंध में उनकी भलाई एवं रहनुमा बनने के लिए दें। वक्त आ गया है कि हमें राज्यों के पुनः विघटन को हर कीमत पर फौलादी इरादों के साथ फिर से किसी को पटेल बन रोकना होगा।

पद्मनाभ का धनलाभ

पद्मनाभ का धनलाभ


?
मंदिर के तहखाने से प्राप्त विष्णु की स्वर्ण मूर्ति मंदिर के तहखाने से प्राप्त विष्णु की स्वर्ण मूर्ति

केरल की राजधानी तिरुअनन्तपुरम के मध्य में स्थित भगवान पद्मनाभ मंदिर के गर्भगृह में स्थित सेलार में जाकर मंदिर में रखे गये धन का बहीखाता तैयार किया जा रहा है. अभी अगले एक हफ्ते तक और आंकलन होता रहेगा. ऐसा अनुमान अब लगाया जा रहा है कि आखिरी सेलार की पड़ताल करने के बाद कुल संपत्ति करीब एक लाख करोड़ के आस पास पहुंच सकती है. यह भी सिर्फ अनुमान ही है क्योंकि सारी गणना करने के बाद गठित टीम अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी, उसके बाद सुप्रीम कोर्ट से ही यह सच्चाई सामने आयेगी कि भगवान पद्मनाभ मंदिर में कितना धन मिला है.
करीब एक लाख करोड़ की परिसंपत्तियां जिस मंदिर के तहखाने में सुरक्षित रखी गयी हैं वह मंदिर आम मंदिर बिल्कुल नहीं है. भगवान विष्णु का यह मंदिर त्रावणकोर राजघारने से संबंध रखता है. मंदिर कितना पुराना है इसका आंकलन ही किया जा सकता है लेकिन मंदिर का वर्तमान स्वरूप उभरा अठारहवी सदी की शुरूआत में जब त्रावणकोर राजघराने ने आठ ताकतवर पिल्लई को परास्त करके मंदिर को अपने अधीन कर लिया. भगवान विष्णु का यह मंदिर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शैव और वैष्णव दोनों ही संप्रदायों में एकता का प्रतीक भी है. मंदिर में शयन मुद्रा में स्थित भगवान विष्णु की मूर्ति की नाभि में स्थित कमल पर ब्रह्मा विराजमान हैं तो खुद भगवान विष्णु शिवलिंग पर जल अर्पित कर रहे हैं. इस तरह यह मंदिर हिन्दू मान्यता के अनुसार सृष्टि के रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता तीनों को समर्पित है.
राजा मार्तण्ड वर्मा ने आठ पिल्लई को परास्त करके उनकी संप्तियों पर कब्जा कर लिया और सभी ताकतवर आठ पिल्लई या तो भाग गये या मारे गये. राजा मार्तण्ड वर्मा ने जिस त्रावणकोर राज्य की स्थापना की उस राज्य को उन्होंने भगवान पद्मनाभ के चरणों में समर्पित कर दिया था. राजा मार्तण्ड वर्मा ने 1729 से 1758 के दौरान शासन किया और इसी दौरान 1733 में उन्होंने वर्तमान मंदिर का निर्माण करवाया जिसे मंदिर का जीर्णोद्धार कहा जाता है. राजा मार्तण्ड वर्मा ने भगवान पद्मनाभ के नाम पर अपनी राजधानी का नाम भी पद्मनाभपुरम रखा जो बाद में 1795 में थिरुअनन्तपुरम हो गया. थिरू का अर्थ होता है श्री और अनन्तपुरम इस इलाके के पौराणिक नाम अनन्तवनम से लिया गया है.
अपने शासनकाल के दौरान ही 1750 में राजा मार्तण्ड वर्मा ने घोषणा कर दी कि हम भगवान विष्णु के दास हैं इसलिए अब राज्य की सभी परिसंपत्तियों के स्वामी भगवान पद्मनाभ होंगे. त्रावणकोर का शासन भी भगवान पद्मनाभ के प्रतिनिधि के रूप में करने की घोषणा राजा मार्तण्ड वर्मा ने कर दी. इसके बाद त्रावणकोर राजघराने का जो भी राजा हुआ उसके नाम के आगे पद्मनाभदास का संबोधन लगा दिया जाता था. यही व्यवस्था कमोबेश 1949 तक चलती रही. 1949 में त्रावणकोर राजघराने को भारत सरकार के अधीन कर लिया गया और राजपरिवार से जुड़े लोगों को पेन्शन दी जाने लगी. 1971 में भारत सरकार ने प्रीविपर्स खत्म कर दिया जिसके कारण राजघरानों को दी जानेवाली सभी सुविधाएं बंद कर दी गयीं और उनके न्यूनतम अधिकार उनसे छीन लिये गये.
त्रावणकोर राजघराने ने कला और साहित्य को प्रमुखता से बढ़ावा दिया यही कारण है कि सन 1900 में महान चित्रकार राजा रवि वर्मा की दो पौत्रियों को राजपरिवार ने गोद ले लिया था. इनमें से एक सेथु लक्ष्मीबाई थी जिन्होंने 1924 से 1931 तक त्रावणकोर राज्य का शासन संभाला. वर्तमान समय में भी राजपरिवार से जुड़े सदस्य पद्मनाभ मंदिर के संरक्षक समझे जाते हैं और साल के दो प्रमुख उत्सवों पल्लिवेत्ता और अरात्तू (पवित्र स्नान) में राजपरिवार के लोग उपस्थित रहते हैं. मंदिर का संचालन भी राजपरिवार द्वारा गठित एक ट्रस्ट के तहत किया जाता है.
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि तहखाने में बंद परिसंपत्तियों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए. याचिकाकर्ता टीपी सुंदरराजन का आरोप था कि मंदिर के संचालन में राजपरिवार नियंत्रित ट्रस्ट गड़बड़ियां कर रहा है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के दो पूर्व जज और दो केरल हाईकोर्ट के पूर्व जजों को मिलाकर एक समिति का गठन किया गया जो मंदिर के बीस फिट नीचे दबे खजाने में मौजूद परिसंपत्तियों का मूल्यांकन कर रहे हैं. इस मूल्यांकन में अभी तक जो अंदाज लग रहा है उससे लगता है कि मंदिर के तहखाने में करीब एक लाख करोड़ की परिसंत्तियां मौजूद हैं.
इन संपत्तियों पर आखिरी दावा किसका होगा यह कहना अभी मुश्किल है. मंदिर का संचालन एक ट्रस्ट के हाथ में है और संपत्तियों पर ट्रस्ट का स्वाभाविक दावा बनता है लेकिन क्योंकि 1971 में प्रीवीपर्स खत्म कर दिया गया है इसलिए सरकार इन संपत्तियों पर अपना दावा कर सकती है. बहरहाल करीब एक लाख करोड़ रूपये की संपत्तियों की मौजूदगी के बाद तिरुअनन्तपुरम का यह भगवान अनंत पद्मनाभ का मंदिर दुनिया का सबसे धनवान मंदिर बन गया है.

एमपी अजब है, सबसे गजब है!

 
एमपी अजब है, सबसे गजब है!

एमपी अजब है, सबसे गजब है। मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के इस नारे की असलियत देखनी हो तो जबलपुर आएं। यहां से 40 किलोमीटर दूर बरगी बांध को बने 23 साल बीत चुके हैं, लेकिन इसके कारण विस्थापित हुए 11 गांवों के लोग वजूद में तो अभी भी मौजूद हैं लेकिन सरकारी रिकार्ड में उनकी कहीं कोई मौजूदगी नहीं बची है। विस्थापन के बाद आज तक सरकारी रिकार्ड में उनकी उपस्थिति दर्ज नहीं हो सकी है। हालांकि इन गांवों में सड़क है, बिजली है और लोग भी रहते हैं पर सरकार इन्हें ‘भूत’ मानकर इनके वजूद को ही नकार रही है।
इस लापरवाही के कारण विस्थापित हुए 1049 परिवारों का जीना मुहाल है। काम-धंधा न होने के कारण लोगों के सामने भूखों मरने की नौबत है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि जब इन गांवों का नामो-निशान ही नहीं है तो फिर विकास परियोजनाओं की मंजूरी मुमकिन नहीं। राज्यह सरकार के अतिरिक्तम क्षेत्रीय आयुक्तो बीके मिंज ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि सरकार ने इन गांवों के लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया है।
बीते दो दशक में चार बार सरकारें बदलीं, लेकिन विस्थातपितों की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के आयुक्तों के मध्य प्रदेश में राज्य सलाहकार की ओर से जबलपुर के जिला कलेक्टकर गुलशन बामरा को भेजे पत्र में इन 11 गांव के लोगों को रोजगार देने का आग्रह किया गया था। इसके फौरन बाद विस्थापित परिवारों के लिए नरेगा के तहत काम के अवसर तो मुहैया कराए गए, लेकिन राजस्व के नक्शे में न होने से लोगों को उनके गांव में ही काम नहीं मिल सका। ऐसे में प्रशासन ने लोगों को सात किलोमीटर दूर सालीवाड़ा में नरेगा के तहत काम दिया। रोजाना 14 किलोमीटर का पैदल सफर और ऊपर से दिनभर हाड़तोड़ मेहनत। लिहाजा इक्का-दुक्का लोगों से कुछ दिनों तक काम किया और फिर सूरत और तमिलनाडु से लेकर मेघालय और सिक्किडम जाकर काम करना ज्यांदा मुनासिब समझा। हालत यह है कि परिवार के सभी लोग एक साथ पलायन करते हैं, क्योंकि सरकार के रिकार्ड में वीरान हो चुके गांवों में किसी सदस्य को छोड़ना जोखिमभरा है। विस्थापित हुए परिवारों में 40 फीसदी से ज्यारदा आदिवासी हैं। चूंकि इनके गांव नक्शे में नहीं हैं, इसलिए इन्हें अस्पएताल, राशन, पानी और बच्चों की शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं भी हासिल नहीं हैं।
कहां और किससे हुई गलती
नर्मदा नदी पर बरगी बांध 1974 में बना। जैसे-जैसे इसमें पानी भरता गया और गांव डूबते गए। उस समय विस्थापन की कोई नीति न होने पर न तो प्रशासन ने लोगों को न तो बसाने की कोई योजना बनाई और न ही उसके पास पुनर्वास के लिए कोई सरकारी जमीन थी। लोगों से सिर्फ इतना कहा गया कि पानी आएगा, आप सब डूब जाओगे। लिहाजा मुआवजा राशि लो और चलते बनो। जान बचाने के लिए लोगों ने अपनी डूबती जमीनों का नाममात्र का मुआवजा लिया और पहाड़ी पर चले गए। इधर गांव खाली हुए और सरकार ने अपने रिकार्ड से उनका नाम गायब कर दिया। दूसरी ओर लोगों ने उसी नाम से गांव बसा लिए, जहां वे पहले रहते थे। जबलपुर, मंडला और सिवनी जिलों के 162 गांव बरगी के पानी में डूबे। इन्हीं 162 गांवों में से 11 गांव सरकारी रिकार्ड से गायब हैं। अब भले ही सरकारी रिकार्ड से ये गांव गायब हो चुके हैं लेकिन हकीकत में ये गांव अपने पूर्ववर्ती नामों के साथ मौजूद हैं।

लापरवाही की इंतिहां
बरगी बांध विस्थापित संघ 1989 से इन 11 गांवों के मामले को सरकार और जिला प्रशासन के सामने उठा रहा है, लेकिन अफसर टस से मस होने को तैयार नहीं हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से लेकर नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण और राज्यस्तरीय समितियों ने प्रशासन से कहा कि वह विस्थापित 11 गांवों को राजस्व के रिकार्ड में शामिल करें, ताकि वहां रहने वाले परिवारों की बेहतरी के लिए योजनाएं चलाई जा सकें। पिछले साल तत्कालीन जिला कलेक्टर हरिरंजन राव कठौतिया ने प्रभावित इलाके का दौरा कर 11 गांवों को आबाद घोषित कर उन्हें राजस्व के रिकार्ड में शामिल करने का वादा किया था, जो आज तक पूरा नहीं हो सका है।

प्रशासन ने किसी की नहीं मानी
•प्रकरण क्र. 5120/96-97/NHRC के संदर्भ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की विजिट 12-15 सितंबर 1996 से उभरी अनुशंसाओं में से एक ।
   
•20 जनवरी 95 को बरगी बांध के पुनर्वास के संबंध में बनाई गई राज्य स्तरीय समिति द्वारा स्पष्ट रुप से आदेशित किया कि वनभूमि या अन्य जमीनों पर जहां पर भी विस्थापित जाकर बसे हैं, उन्हें वहीं पर सैटल कर उनकी उस भूमि को आबादी घोषित करना।
    
•2/11/93 को डॉ. बी.डी.शर्मा की अध्यक्षता में हुई राज्य स्तरीय समिति की बैठक में लिये गये निर्णय के अनुसार यह प्रक्रिया 30 अप्रैल 1994 तक पूरी हो जानी थी।
    
•17/03/94 को डॉ. बी.डी.शर्मा की अध्यक्षता में हुई राज्य स्तरीय समिति की बैठक में लिये गये निर्णय के अनुसार यह प्रक्रिया 30 अप्रैल 1994 तक पूरी हो जानी थी।
    
•20/1/95 को भी तत्कालीन नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण आयुक्त अध्यक्ष डॉ. रणजीत सिंह जी ने सभी जिला कलक्टरों के इस संबंध में आदेशित किया था।
BMM