2.6.12

‘आयोडीन युक्त’ नमक- सच्चाई क्या है?

'आयोडीन युक्त' नमकजिनका बचपन कस्बों या बड़े गाँवों में बीता है, उन्हें याद होगा कि पहले किराने की दूकानों में नमक की बोरियों को दरवाजे के बाहर ही रखा जाता था- रात में जब दूकान के दरवाजे बन्द होते थे, तब ये बोरियाँ बाहर ही रखी रहती थीं। यह सबसे सस्ता भी हुआ करता था।
बाद के दिनों में बड़े एवं मँझोले व्यवसायिक घरानों की (गिद्ध)दृष्टि इस चीज पर पड़ी होगी- अरे, इसे तो गरीब-से-गरीब परिवार भी खरीदता है, क्यों न इस व्यवसाय से कमाई की जाय। और एक षड्यंत्र के तहत “आयोडीन युक्त” नमक का हौव्वा खड़ा किया गया तथा साधारण नमक की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगाते हुए इसे बाजार से हटा ही दिया गया। सरकार ने व्यवसायिक घरानों का भरपूर साथ दिया- इसका अफसोस नहीं है (सरकार का तो यह काम ही है); मगर हमारे वैज्ञानिक समुदाय ने भी इस षड्यंत्र में व्यवसायिक घरानों का साथ दिया- यह अफसोस की बात है।
मान लिया कि “आयोडीन युक्त” नमक जरूरी है, मगर इस व्यवसाय को कुटीर एवं लघु उद्योगों की ही श्रेणी में क्यों नहीं रखा गया? क्यों “टाटा” को भी नमक बेचने की अनुमति दी गयी, जो “ट्रक” भी बेचता है? नमक में “आयोडीन” मिलाकर उसे प्लास्टिक की थैलियों में पैक करने में क्या बहुत ही हाई-फाई तकनीक की जरुरत होती है?
रेडियो पर दिनभर सरकारी विज्ञापन (पी.एस.ए.) आता है कि खाने में आयोडीन युक्त नमक का इस्तेमाल करने से बच्चा शारीरिक व मानसिक रुप से तन्दुरुस्त पैदा होता है। और लोग इसे किस रुप में देखते हैं, पता नहीं; मगर मैं इसे इस रुप में देखता हूँ कि सरकार गरीब जनता को मूर्ख बना रही है- वह कहती है, बस “आयोडीन युक्त” नमक का इस्तेमाल करो, बच्चा स्वस्थ एवं मेधावी बनेगा- “पौष्टिक आहार” की कोई जरुरत ही नहीं है! इस विज्ञापन का उपयोग सरकार गरीबों पर “अफीम” के रुप में कर रही है। अब सरकार गरीब गर्भवती महिलाओं को दूध-फल तो दे नहीं सकती, सो उन्हें बहला रही है। जबकि यह तथ्य है कि गर्भावस्था में चूँकि बच्चा माँ के शरीर से ही अपना भोजन ग्रहण करता है, इसलिए माँ के लिए “पौष्टिक आहार” जरूरी है।
विज्ञापन यह बताना भी नहीं भूलता कि “सूई की नोंक बराबर” आयोडीन की हमें आवश्यकता होती है। क्या आयोडीन की इतनी नगण्य मात्रा “साधारण नमक” में नहीं होती? फिर प्राचीनकाल से लेकर बीसवीं सदी तक इस देश में स्वस्थ एवं मेधावी लोग कैसे पैदा हो गये? कौन जानता है कि “आयोडीन युक्त” नमक की थैलियों में भरे गये नमक में “अलग से” “आयोडीन” मिलाया ही जाता है? क्या इन थैलियों में “साधारण नमक” ही नहीं होता? दिल्ली-मुम्बई में जो “मिनरल वाटर” बिकता है, क्या उनमें सादा (या फिल्टर किया हुआ) पानी नहीं होता? कौन मिलाता है उनमें “मिनरल”?
कोई कुछ भी कहे, मेरा दिल तो यही कहता है कि “आयोडीन युक्त” नमक की “अनिवार्यता” की बात एक “हौव्वा” है, एक षड्यंत्र है; कुछ व्यवसायिक घराने इसकी आड़ में जबर्दस्त कमाई कर रहे हैं; सरकार कुछ हिस्सा लेकर उनके लिए प्रचार कर रही है; और जाने-अनजाने में हमारा वैज्ञानिक समुदाय भी इस षड्यंत्र में शामिल है!
(कभी-न-कभी इस षड्यंत्र का पर्दाफाश होगा- यह भी मैं जानता हूँ!)

वृन्दावन में होता है विधवाओं की लाशों से खिलवाड़

राज्य के अधिकारी बिना अदालत के निर्देश के तो काम करते नहीं है : सुप्रीम कोर्ट
जीवन के अंतिम पहर में भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के लिए देशभर से आकर वृंदावन में बसी विधवाओं की लाशों की दुर्गति पर सुप्रीम कोर्ट ने 30 अप्रैल को कड़ी नाराजगी जताई है। उत्तर प्रदेश सरकार को आड़े हाथों लेते हुए अदालत ने कहा कि राज्य के अधिकारी तो अदालत के निर्देश के बिना कुछ करना ही नहीं चाहते। राष्ट्रीय न्यायिक सेवा प्राधिकरण (National Legal Service Authority) की जनहित याचिका पर सर्वोच्च अदालत ने केंद्र व प्रदेश सरकार को अगले बुधवार तक जवाब दाखिल करने को कहा है।
एनएलएसए ने अपनी जिला शाखा डीएलएसए (Delhi Legal Service Authority) की ओर से इस मसले पर एक सर्वेक्षण किए जाने के बाद शीर्षस्थ अदालत का दरवाजा खटखटाया। साथ ही डीएलएसए की रिपोर्ट के आधार पर ईसीपीएफ एनजीओ के अधिवक्ता रविंदर बाना ने एक आवेदन दायर किया।
रिपोर्ट के अनुसार सरकारी रैनबसेरों में रहने वाली विधवाओं और वृद्ध महिलाओं की लाश को काटकर बोरे में भरकर फेंक दिया जाता है। जबकि यह महिलाएं जीवित रहते सफाई कर्मियों के पास अपने दाह संस्कार का खर्च जमा कर चुकी होती हैं। इस रिपोर्ट में कई उदाहरण भी पेश किए गए हैं जो रोंगटे खड़े करने वाले हैं।
जस्टिस डीके जैन की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष एनएलएसए की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने कहा कि जिंदा रहते ही नहीं देशभर से आकर वृंदावन में रहने वाली विधवाओं की लाश को भी उचित दाह संस्कार नहीं मिल पाता। इस पर पीठ ने पूछा कि क्या सिर्फ वृंदावन में ही ऐसी स्थिति हैं या देश में अन्य जगहों में भी विधवाओं की यही दुर्दशा है। जवाब में अधिवक्ता ने कहा कि देश में कई धार्मिक स्थल हैं, जहां पर विधवाएं दुख झेल रही हैं। बनारस, पुरी सहित कई ऐसे शहर हैं, जहां पर विधवाएं पूरा दिन महज एक पहर के भोजन के लिए भजन गाती हैं।
अधिवक्ता ने पीठ को बताया कि सरकार की ओर से 400 रुपये प्रति माह विधवा पेंशन की व्यवस्था है। लेकिन यह पेंशन भ्रष्टाचार की वजह से पूरी पहुंच ही नहीं पाती। पीठ ने कहा कि समुचित व्यवस्था के लिए सही आंकड़े चाहिए होंगे। जवाब में अधिवक्ता ने कहा कि यह आंकड़े कुछ एनजीओ ने इकट्ठा किए हैं।
पीठ ने कहा कि इस पर सरकारी आंकड़े एकत्र किए जाने की जरूरत है और केंद्र को नोटिस जारी करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के अधिवक्ता से कहा कि राज्य के अधिकारी बिना अदालत के निर्देश के तो काम करते नहीं है। ऐसे में राज्य की ओर से भी अगली सुनवाई तक जवाब दाखिल कर दिया जाना चाहिए।
सर्वोच्च अदालत ने नवंबर, 2008 में इस मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग को व्यापक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था और बाद में केंद्र व राज्य सरकार को विधवाओं को दुर्दशा से उबारने के लिए कदम उठाने को कहा था। हाल ही में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इस मामले में शीर्षस्थ अदालत से कहा था कि वृंदावन की विधवाओं के लिए स्वाधर योजना के तहत यूपी महिला कल्याण निगम को 14 करोड़ 25 लाख की धनराशि जारी कर दी गई है। इस राशि से इन महिलाओं के लिए शरणगृह बनाए जाएंगे व अन्य जरूरी सुविधाएं मुहैया कराई जाएगी।
स्रोत  : अमर उजाला

जरा अपने सभ्यता-संस्कृति को टटोलें

Nalanda_University

सांस्कृतिक विकृतीकरण के इस युग में भारतवर्ष के समृद्ध गौरवशाली इतिहास को याद रखना और याद दिलाना सामयिक जरुरत बन गया है .अंग्रेजों द्वारा बुने गये सूक्ष्म जाल में हम भारतीय यूँ उलझे कि अपने ही गौरव को भूल कुंठित हो चले हैं . आज अपनी सभ्यता-संस्कृति हमें इतनी तुच्छ मालूम होने लगी है कि पाश्चात्य का अंधाधुंध अनुकरण हमारी आदत बन गयी है . अब ,अतीत की गहराइयों में जरा अपने सभ्यता-संस्कृति को टटोलें तो हमारी समृद्ध शैक्षिक -सांस्कृतिक -राजनीतिक और आर्थिक  परंपरा का अंदाजा हो जाएगा .
विश्व का सबसे प्रथम विश्वविद्यालय 700 ई.पू. में तक्षशिला में स्थापित किया गया था। इसमें 60 से अधिक विषयों में 10,500 से अधिक छात्र दुनियाभर से आकर अध्ययन करते थे। नालंदा विश्वविद्यालय चौथी शताब्दी में स्थापित किया गया था जो शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की महानतम उपलब्धियों में से एक है।
सभ्यताओं की आदिस्थली भारत ने विश्व इतिहास के अनुसार विगत 100000 वर्षों में किसी भी देश पर हमला नहीं किया है। जबकि 5000 साल पहले भारतीय सिंधु घाटी सभ्यता और हड़प्पा संस्कृति एक विकसित संस्कृति थी। भारत का अंग्रेजी में नाम 'इंडिया' इंडस नदी से बना है, जिसके आस-पास की घाटी में आरंभिक सभ्यताएं निवास करती थी। सिंधु नदी को ही इंडस नदी कहा गया। पर्शिया के आक्रमणकारियों ने  हिन्दु धर्म के अनुसार इस देश का नाम 'हिन्दुस्तान'  कर दिया। विश्व का सबसे प्रथम विश्वविद्यालय 700 ई.पू. में तक्षशिला में स्थापित किया गया था। इसमें 60 से अधिक विषयों में 10,500 से अधिक छात्र दुनियाभर से आकर अध्ययन करते थे। नालंदा विश्वविद्यालय चौथी शताब्दी में स्थापित किया गया था जो शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की महानतम उपलब्धियों में से एक है।
आयुर्वेद मानव जाति के लिए ज्ञात सबसे आरंभिक चिकित्सा शाखा है। शाखा विज्ञान के जनक माने जाने वाले चरक ने 2500 वर्ष पहले आयुर्वेद का समेकन किया था। भारत 17 वीं शताब्दी के आरंभ तक ब्रिटिश राय आने से पहले सबसे सम्पन्न देश था। क्रिस्टोफर कोलम्बस ने भारत की सम्पन्नता से आकर्षित हो कर भारत आने का समुद्री मार्ग खोजा, उसने गलती से अमेरिका को खोज लिया।  भास्कराचार्य ने खगोल शास्त्र के कई सौ साल पहले पृथ्वी द्वारा सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने में लगने वाले सही समय की गणना की थी। उनकी गणना के अनुसार सूर्य की परिक्रमा में पृथ्वी को 365 दिन का समय लगता है।
भारतीय गणितज्ञ बुधायन द्वारा 'पाई' का मूल्य ज्ञात किया गया था और उन्होंने जिस संकल्पना को समझाया उसे पाइथागोरस का प्रमेय करते हैं। उन्होंने इसकी खोज छठवीं शताब्दी में की, जो यूरोपीय गणितज्ञों से काफी पहले की गई थी। बीजगणित, त्रिकोणमिति और कलन का उद्भव भी भारत में हुआ था। चतुष्पद समीकरण का उपयोग 11वीं शताब्दी में श्रीधराचार्य द्वारा किया गया था। शतरंज की खोज भारत में की गई थी। 'स्थान मूल्य प्रणाली' और 'दशमलव प्रणाली' का विकास भारत में 100 ई.पू. मेेंं हुआ था। विश्व का प्रथम ग्रेनाइट मंदिर तमिलनाडु के तंजौर में बृहदेश्वर मंदिर है। इस मंदिर के शिखर ग्रेनाइट के 80 टन के टुकड़े से बने हैं।
यह भव्य मंदिर राजा राज चोल के राय के दौरान केवल 5 वर्ष की अवधि में (1004ई. और 1009 ई. ) निर्मित किया गया था। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और विश्व का छठवां सबसे बड़ा देश तथा प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। सांप-सीढ़ी का खेल तेरहवीं शताब्दी में कवि संत ज्ञान देव द्वारा तैयार किया गया था इसे मूल रूप से मोक्षपट कहते थे।  सुश्रूत को शल्य चिकित्सा का जनक माना जाता है। लगभग 2600 वर्ष पहले सुश्रूत और उनके सहयोगियों ने मोतियाबिंद, कृत्रिम अंगों को लगाना, शल्य क्रिया द्वारा प्रसव, अस्थिभंग जोड़ना, मूत्राशय की पथरी, प्लास्टिक सर्जरी और मस्तिष्क की शल्य क्रियाएं आदि की। निश्चेतक का उपयोग भारतीय प्राचीन चिकित्सा विज्ञान में भली-भांति ज्ञात था। शारीरिकी, भ्रूण विज्ञान, पाचन, चयापचय, शरीर क्रिया विज्ञान, इटियोलॉजी, आनुवांशिकी और प्रतिरक्षा विज्ञान आदि विषय भी प्राचीन भारतीय ग्रंथों में पाए जाते हैं।
भारत में 4 धर्मों का जन्म हुआ- हिन्दू धर्म, बौध्द धर्म, जैन धर्म और सिक्ख धर्म, जिनका पालन दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा करता है।
जैन धर्म और बौध्द धर्म की स्थापना भारत में क्रमश: 600 ई.पू. और 500ई.पू. हुई थी। इस्लाम भारत का और दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा धर्म है।
भारत में 3,00,000 मस्जिदें हैं जो किसी अन्य देश से अधिक हैं, यहां तक कि मुस्लिम देशों से भी अधिक।
भारत में सबसे पुराना यूरोपियन चर्च कोचीन शहर में है। इनका निर्माण 1503 में किया गया था। विश्व में सबसे बड़ा धार्मिक भवन अंगकोरवाट, हिन्दू मंदिर है जो कम्बोडिया में 11वीं शताब्दी के दौरान बनाया गया था।
तिरुपति शहर में बना विष्णु मंदिर 10वीं शताब्दी के दौरान बनाया गया था, यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक गंतव्य है। रोम या मक्का से अधिक इस स्थान पर प्रतिदिन औसतन 30 हजार श्रध्दालु आते हैं और लगभग 6 मिलियन अमेरिकी डॉलर प्रति दिन चढ़ावा आता है। सिक्ख धर्म का उद्भव पंजाब के पवित्र शहर अमृतसर में हुआ था। यहां प्रसिध्द स्वर्ण मंदिर की स्थापना 1577 में गई थी।
वाराणसी, जिसे बनारस के नाम से भी जाना जाता है, एक प्राचीन शहर है जब भगवान बुध्द ने 500 ई.पू. में यहां आगमन किया और यह आज विश्व का सबसे पुराना और निरंतर आगे बढ़ने वाला शहर है। भारत द्वारा श्रीलंका, तिब्बत, भूटान, अफगानिस्तान और बंगलादेश के 3,00,000 से अधिक शरणार्थियों को सुरक्षा दी जाती है, जो धार्मिक और राजनैतिक अभियोजन के फलस्वरूप वहां से निकल गए हैं।
माननीय दलाई लामा तिब्बती बौध्द धर्म के निर्वासित धार्मिक नेता हैं, जो उत्तरी भारत के धर्मशाला से अपने निर्वासन में रह रहे हैं। युध्द कलाओं का विकास सबसे पहले भारत में किया गया और ये बौध्द धर्म प्रचारकों द्वारा पूरे एशिया में फैलाई गई। योग कला का उद्भव भारत में हुआ है और यहां 5,000 वर्ष से अधिक समय से योग में निपुणता मौजूद हैं। भारत से 90 देशों को सॉफ्टवेयर का निर्यात किया जाता है। वर्ष 1986 तक भारत विश्व में हीरे का एक मात्र स्रोत था।  बेलीपुल विश्व में सबसे ऊंचा पुल है। यह हिमाचल पवर्त में द्रास और सुरु नदियों के बीच लद्दाख घाटी में स्थित है। इसका निर्माण अगस्त 1982 में भारतीय सेना द्वारा किया गया था। दुनिया का सबसे ऊंचा क्रिकेट का मैदान हिमाचल प्रदेश के चायल नामक स्थान पर है। इसे समुद्री सतह से 2444 मीटर की ऊंचाई पर बनाया गया है। भारत डाक खाना के मामले में विश्व में अव्वल है। विश्व की सबसे बड़ी नियोक्ता भारतीय रेल है, जिसमें दस लाख से अधिक लोग काम करते हैं।

फतेहपुर सिकरी किसने बनवाया ?

आगरा के निकट एक प्रसिद्द एतिहासिक स्थल फतेहपुर सीकरी है जिसे अकबर द्वारा निर्मित बताया जा रहा है जबकि अनेक ऐतिहासिक साक्ष्य सिद्ध कराते हैं कि अकबर से इसके निर्माण का कोई सम्बन्ध नहीं है. यह महाभारत से पूर्व देवों द्वारा बसाया गया एक लाल पत्थरों से बना नगर था जिसमें देव परिवार रहते थे. इसका निर्माण काल अब से लगभग २,५०० वर्ष पूर्व इस आधार पर सिद्ध होता है कि सिकंदर का भारत पर आक्रमण ईसापूर्व ३२३ में हुआ जिसके १५ माह बाद महाभारत युद्ध हुआ. इस युद्ध में सिकंदर उपस्थित था जिसे ‘महाभारत’ ग्रन्थ में शिखंडी कहा गया है तथा जो समलैंगिक मैथुन के लिए प्रसिद्द था. इसकी समलैंगिकता का चित्रण अभी कुछ वर्ष पहले हॉलीवुड से निर्मित फिल्म Alexander में भी किया गया है.
फतेहपुर सीकरी लगभग ४ वर्ग किलोमीटर क्षत्र में फैला एक नगर था जो ध्वस्त किया जाकर केवल कुछ भवनों तक सीमित कर दिया गया है. मुस्लिम शासकों द्वारा कब्रिस्तान में परिवर्तित किये जाने के बाद भी वर्तमान भवन भी वास्तुकला और सौन्दर्य के अद्भुत उदाहरण हैं. इसके मुख्य भवन के प्रांगण में सलीम चिश्ती का स्मारक बना है जो स्पष्ट रूप से बाद का निर्माण है और संभवतः यही अकबर द्वारा बनवाया गया था. अकबर के शासन काल में भी यह नगर इतना भव्य था कि उसने इसे अपनी राजधानी बनने का प्रयास किया. किन्तु उसके इंजीनिअर इस नगर के प्राचीन जल-प्रदाय संस्थान को सक्रिय न कर सके और वह इसे त्याग कर दिल्ली चला आया. यह विशाल जल संस्थान अब भी सुरक्षित है किन्तु इसे समझने और सक्रिय करने के कोई प्रयास वर्तमान सरकारी वेतनभोगी तथाकथित विशेषज्ञों ने नहीं किये हैं. यदि यह नगर तथा जल संस्थान अकबर द्वारा बनवाया गया होता तो उसे जलाभाव में यह नगर छोड़ने की विवशता नहीं होती. नगर के पश्चिमी किनारे पर एक जलधारा का सतत प्रवाह रहता है जिसके समीप ही जल-संस्थान स्थित है.
नगर के मुख्य भवन का द्वार बुलंद दरवाजा कहलाता है जिसके विशाल मुख पर ईसा मसीह का एक वाक्य उत्कीर्ण है जो अकबर कदापि नहीं कराता क्योंकि विश्व का सबसे लम्बा युद्ध ईसाई और इस्लाम धर्मावलम्बियों के मध्य हुआ है जो ६३० से आरम्भ होकर १९वीं शताब्दी तक चला है.
अकबर इस नगर में एक युद्ध में विजय प्राप्ति के बाद आया था, उस समय ऐसे भव्य नगर का निर्माण करना एक असंभव कल्पना है. नगर के एक भवन को आज भी ‘सीताजी की रसोई’ कहा जाता है जो इस नगर का देवों के साथ सम्बन्ध स्थापित करता है. जल संस्थान के दक्षिण में ऊंची चारदीवारी से घिरा एक प्रांगण है जिसके मद्य एक जलताल है. इस प्रांगण में देवी दुर्गा के पालतू शेर रखे जाते थे जिनपर सवारी कर वह दुष्टों का संहार करने जाया करती थीं. दुष्टों में उनका इतना आतंक था कि वे रात्रि भर जागृत रहते और देवी को प्रसन्न रखने के लिए उनके गुणगान कराते रहते. इसी प्रचलन को आज देवी-जागरण कहा जता है जो पुनजब क्षेत्र से फैलता हुआ उत्तरी भारत के अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है. यही देवी दुर्गा मूलतः ईसा मसीह की बड़ी बाहें मरियम थीं जो विष्णु से विवाह होने के कारण ‘विष्णुप्रिया’ भी कहलाती थीं. विष्णु का एक नाम लक्ष्मण होने के कारण इन्ही देवी को ‘लक्ष्मी’ के रूप में भी जाना जाता है. वैश्य समाज की ये आराध्य देवी हैं क्योंकि वैश्य (गुप्त) वंश का आरम्भ इन्ही के पुत्र चन्द्र गुप्त मोर्य से हुआ. काली के रूप में भी ये शतरूप\ओं का संहार किया करती थीं.
फतेहपुर सीकरी के मुख्य भवन के उत्तर में एक विद्यालय भवन है जहाँ देवों के बच्चे शिक्षा पाते थे. यह नगर उस समय बनाया गया जब यवन समुदाय ने देवों को सताना आरम्भ कर दिया था और देव पुरुष संघर्षों में व्यस्त रहते थे. इसलिए परिवारों को सुरक्षित रखने के लिए इस नगर को बसाया गया जिसकी चारदीवारी में केवल एक द्वार था जो पूर्व की ओर आज भी स्थित है. नगर के मुख्य भवनों में देव परिवार रहते थे तथा स्त्रियाँ ग्रंथों के लेखन का कार्य करती थीं. महाभारत की रचना प्रमुखतः इसी नगर में की गयी जिसमें देव स्त्रियों का प्रमुख योगदान है.

गाँधी नहीं थे सत्याग्रह के प्रणेता

:- विजय कुमार

कुछ बातें कुछ लोगों के साथ चिपक जाती हैं, या यों कहें कि जबरन चिपका दी जाती हैं। कुछ ऐसा ही सत्याग्रह और गांधी जी के साथ है। निःसंदेह गांधी जी ने सत्याग्रह रूपी शस्त्र का प्रयोग कर जन-जन में स्वाधीन होने की इच्छा जगाई। लाखों लोग सड़कों पर उतरे। यद्यपि ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इससे देश को स्वाधीनता नहीं मिली; पर 1947 के बाद सत्ताधारी कांग्रेस ने निजी स्वार्थ हेतु स्वाधीनता का कारण गांधी जी और उनके चरखे की चूं-चूं को घोषित कर दिया।
इसके साथ ही एक बड़ा झूठ गांधी जी के साथ यह चिपका दिया गया है कि सत्याग्रह का सर्वप्रथम प्रयोग उन्होंने ही किया। पहले उन्होंने इसे अफ्रीका में आजमाया और फिर भारत में। इसलिए दुनिया में कहीं भी कोई सत्याग्रह करे, तो उसे गांधी का प्रभाव मान लिया जाता है। यद्यपि अब इसकी गंभीरता इतनी घट गयी है कि इसे मजाक में ‘गांधीगीरी’ कहा जाने लगा है।
वस्तुतः भारत में सत्याग्रह का प्रयोग विभिन्न रूपों में सदा से होता रहा है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पूर्वज महाराजा दिलीप निःसंतान थे। अतः पूरे परिवार एवं राजमहलों में उदासी छायी रहती थी। अपने कुलगुरू के आदेश पर राजा और रानी ने नंदिनी गाय की सेवा का व्रत स्वीकार किया। कुलगुरू ने उन्हें बताया कि नंदिनी की सेवा (और उसके अमृतमयी दूध के साथ आवश्यक ओषधियां लेने, पथ्य परहेज करने आदि से) उनके महल में निश्चित ही किलकारियां गंूजेंगी।
संतान का आकर्षण किसे नहीं होता ? राजा और रानी ने इस कठोर व्रत को स्वीकार कर लिया। अब जब नंदिनी बैठती, तब ही वे बैठते। जब वह सोती, तब उसे मक्खी-मच्छरों से बचाने के लिए दोनों पंखा करते। सोते हुए भी उसे कष्ट न हो, अतः दोनों में से कोई एक अवश्य जागता रहता। नंदिनी के लिए नरम घास का बिस्तर बनाते और स्वयं चटाई पर लेटते। उसे भरपेट भोजन कराने के बाद ही वे अन्न-जल मुंह में डालते। वह जंगल में चरने जाती, तो वे उसके साथ जाते और वापस लौटते। इस प्रकार कई महीने बीत गये।
भारतीय इतिहास और पुराण ग्रन्थों में बहुत सी बातें प्रतीकों के रूप में कही गयी हैं। ऐसा कहते हैं कि भगवान भोलेनाथ उनकी सेवा भावना से प्रसन्न हुए। वे उन्हें संतान का वर तो देना चाहते थे; पर अंतिम रूप से वे एक प्रत्यक्ष परीक्षा (अपअं.अवबम) और लेना चाहते थे। अतः एक बार जब नंदिनी जंगल में घास चर रही थी, तो अचानक एक सिंह ने प्रकट होकर उसे दबोच लिया। राजा दिलीप बड़े असमंजस में पड़ गये। वे निःशस्त्र थे और इस सेवा साधना के दौरान कैसी भी हिंसा वर्जित थी।
मजबूर होकर राजा ने सिंह से गाय को छोड़ देने की प्रार्थना की। इस पर सिंह बोला कि उसे भूख लगी है और पशु उसका स्वाभाविक आहार है। यदि राजा उसके लिए कोई और पशु ला दे, तो वह गाय को छोड़ देगा। अहिंसा व्रत का पालन कर रहे राजा के लिए यह भी संभव नहीं था। इधर सिंह की भूख बढ़ रही थी। वह नंदिनी पर दबाव बढ़ा रहा था। नंदिनी भयभीत नेत्रों से राजा की ओर देख रही थी।
अंततः राजा ने सत्याग्रह का निर्णय लिया। उन्होंने सिंह से आग्रह किया कि वह उन्हें खाकर अपनी भूख मिटा ले और गाय को छोड़ दे। सिंह मान गया। राजा प्राणों का मोह छोड़कर सिर झुकाकर घुटनों के बल बैठ गये; पर काफी समय बीतने पर भी जब सिंह ने आक्रमण नहीं किया, तो राजा ने सिर उठाया। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। क्योंकि वहां तो भगवान भोलेनाथ स्वयं उपस्थित थे। उसके बाद उन्होंने राजा को इच्छित वर दिया, जिससे उनका वंश खूब फला-फूला।
राजा शिबि की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक बार जब वे दरबार में बैठे थे, तो एक कबूतर उनकी गोद में आकर छिप गया। उसका पीछा एक भूखा गरुड़ कर रहा था। गरुड़ ने भी राजा से कहा कि वह कबूतर को उसे सौंप दे; पर शिबि शरणागतों के रक्षक थे। उन्होंने मना कर दिया। अंत में यह सहमति हुई कि राजा कबूतर के भार के बराबर अपना मांस गरुड़ को दे दें।
दरबार में ही तराजू मंगाया गया। एक पलड़े पर कबूतर और दूसरे पर राजा अपने शरीर के टुकड़े रखते गये; पर कबूतर का पलड़ा नीचे ही रहा। अंततः शिबि स्वयं दूसरे पलड़े पर बैठ गये। ऐसा होते ही भगवान भोलेनाथ प्रकट हो गये, जो राजा के शरणागत रक्षा वाले वचन की परीक्षा ले रहे थे। राजा ने सत्याग्रह के माध्यम से अपने वचन को सत्य सिद्ध कर दिखाया।
भारतीय इतिहास में ऐसे एक नहीं, हजारों उदाहरण हैं। ‘‘रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जांहि पर वचन न जाई’’ भी तो सत्य और अपने वचन पर आग्रह का ही उद्घोष करता है। राजा दशरथ चाहते, तो कैकेयी को दुत्कार सकते थे। पूरा राज्य राजा के साथ था; पर राजा ने अपने वचन का पालन किया। और श्रीराम ने तो पिता के आदेश की प्रतीक्षा भी नहीं की। वे वचन की बात सुनते ही वन को चल दिये। भरत भी 14 वर्ष तक उनकी पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर व्रत-उपवास के साथ जीवन बिताते रहे। शत्रु का सगा भाई होते हुए भी शरणागत वत्सल श्रीराम ने विभीषण को अभयदान दिया। यह सत्याग्रह नहीं, तो और क्या है ? बालक धु्रव और प्रह्लाद, सीता, सावित्री, द्रौपदी और राजा हरिश्चंद्र आदि की कथाएं भी सत्याग्रह का अनुपम उदाहरण हैं।
भीष्म की प्रतिज्ञा और उसके पालन के लिए अस्त्र-शस्त्रों का त्याग, अभिमन्यु की वीरगति का समाचार पाकर अर्जुन की प्रतिज्ञा और उसके पूरा न होने पर चितारोहण की तैयारी, श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल की 100 गालियों को सहन करना, कर्ण द्वारा सब जानते हुए भी कवच और कुंडलों का त्याग, द्रोणाचार्य द्वारा अश्वत्थामा की मृत्यु का झूठा समाचार सुनकर शस्त्र त्याग.. आदि सत्याग्रह के ही तो उदाहरण हैं। फिर भी न जाने क्यों सत्याग्रह का प्रणेता गांधी बाबा को बता दिया जाता है।
रामायण और महाभारत काल को सत्य मानने से जिनके पेट में दर्द होता हो, वे मुगल हमलों के काल को तो मानते ही होंगे, जब इस सत्याग्रह ने कई बार ‘सद्गुणविकृति’ का रूप भी लिया है। राजा पृथ्वीराज चैहान ने 16 बार मौहम्मद गौरी को क्षमा किया। राजा हम्मीर ने अलाउद्दीन खिलजी के भगोड़े सैनिक मुहम्मदशाह को अभयदान दिया। परिणाम दोनों बार इनके और देश के विरुद्ध गये। मुगल काल में वीर हकीकत, गुरू तेगबहादुर, भाई मतिदास, सतिदास और दयाला, बन्दा बैरागी, जोरावर और फतेह सिंह आदि के बलिदान भी तो सत्याग्रह ही हैं। यदि वे मुसलमान बन जाते, तो अपार धन सम्पदा और सुख सुविधाएं पा सकते थे; पर उन्होंने सत्य का आग्रह नहीं छोड़ा और मृत्यु का वरण किया। हजारों हिन्दू वीर माताओं और बहिनों का जौहर भी तो सत्याग्रह ही है।
थोड़ा और आगे चलें। जिला सुरेन्द्र नगर, गुजरात के मुली कस्बे में गत 600 वर्ष से तीतर की रक्षा हित हुए युद्ध की याद में एक मेला होता है। सिंध के निवासी सोधा परमार जाति के लोग 1474 ई0 में मुली गांव में आकर बसे। एक बार सूर्य देवता के प्रतीक मंडावरै जी की प्रतिमा के पीछे एक घायल तीतर छिप गया। उसे ढूंढते हुए चाबड़ जाति के शिकारी आये; पर परमारों के मुखिया लखबीर जी की मां जोमबाई ने शरणागत को वापस करने से मना कर दिया। इस बात पर हुए युद्ध में लखबीर के छोटे भाई मंुजोजी सहित 200 परमार तथा 400 चाबड़ योद्धा मारे गये। क्या यह सत्याग्रह नहीं था ?
5 सितम्बर, 1730 (भादों शुक्ल दशमी, वि0संवत 1787) को अलवर के पास ग्राम खेजड़ली में हरे पेड़ों की रक्षा के करते हुए इमरती देवी के नेतृत्व में 363 स्त्री-पुरुषों और बच्चों द्वारा 27 दिन तक लगातार चलाये गये बलिदान पर्व को क्या कहेंगे ? 28 वें दिन राजा को स्वयं वहां आकर इन पर्यावरण प्रेमियों के सम्मुख अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा मांगनी पड़ी। आज भी उस घटना की स्मृति में वहां विशाल मेला होता है। अंग्रेजी तोपों के आगे खड़े होने वाले कूकाओं और हंसते हुए फांसी का फन्दा चूमने वाले भगतसिंह आदि क्रांतिवीरों के सत्याग्रह के आगे गांधीवादियों का सत्याग्रह कुछ नहीं बेचता।
ऐसे प्रसंग भारत के चप्पे-चप्पे पर बिखरे हैं। वस्तुतः गांधी जी ने इनसे प्रेरणा लेकर सत्याग्रह को अंग्रेजों के विरुद्ध एक युगानुकूल शस्त्र का रूप दिया, जिससे स्वाधीनता आंदोलन को भरपूर लाभ हुआ। गांधी जी के मन पर बचपन में अपनी मां से सुनी श्रीराम, श्रीकृष्ण, ध्रुव, प्रह्लाद, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, अभिमन्यु आदि की उन कहानियों का बहुत प्रभाव था, जिनमें बार-बार सत्य और अपने वचन पर आग्रह की बात आती है। इससे ही गांधी जी के मन में सत्याग्रह की भूमिका बनी होगी।
गांधी जी निःसंदेह सत्य के आग्रही थे; पर उन्हें सत्याग्रह का प्रणेता बताकर भारत की लाखों वर्षों की परम्परा पर धूल डालना निरा दुराग्रह है। ऐसे लोगों के लिए भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कहा है – सबसे भले हैं मूढ़, जिन्हें न व्यापै जगत गति।।

भारत और विश्व की महत्वपूर्ण तारीखें

भारतीय इतिहास में महत्‍वपूर्ण तारीखें
ईसा पूर्व
ईसवीं
1000 – 1499
1500 – 1799
1800 – 1900
1900 – 1970
1971 – 2004
भारत की महत्‍वपूर्ण तिथियाँ
12 जनवरी- राष्‍ट्रीय युवा दिवस
15 जनवरी- सेना दिवस
26 जनवरी- गणतंत्र दिवस
30 जनवरी- शोक दिवस
24 फरवरी- केन्‍द्रीय शुल्‍क दिवस
28 फरवरी- राष्‍ट्रीय विज्ञान दिवस
5 अप्रैल- राष्‍ट्रीय नौसेना दिवस
11 मई- राष्‍ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस
9 अगस्‍त- भारत छोड़ो दिवस
15 अगस्‍त- स्‍वतंत्रता दिवस
29 अगस्‍त- राष्‍ट्रीय खेल दिवस
5 सितम्‍बर- शिक्षक दिवस और संस्‍कृत दिवस
8 अक्‍टूबर- भारतीय वायुसेना दिवस
10 अक्‍टूबर- राष्‍ट्रीय डाक दिवस
14 नवम्‍बर- बाल दिवस
18 दिसम्‍बर- अल्‍पसंख्‍यक अधिकार दिवस
23 दिसम्‍बर- किसान दिवस
विश्‍व के महत्‍वपूर्ण दिवस
10 जनवरी- विश्‍व हंसी दिवस
26 जनवरी- अंतरराष्‍ट्रीय कस्‍टम दिवस
30 जनवरी- विश्‍व कुष्‍ठ उन्‍मूलन दिवस
8 मार्च- अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस, अंतरराष्‍ट्रीय साक्षरता दिवस
15 मार्च- विश्‍व अक्षमता दिवस और विश्‍व उपभोक्‍ता अधिकार दिवस
21 मार्च- विश्‍व वानिकी दिवस और रंगभेद के उन्‍मूलन के लिए अंतरराष्‍ट्रीय दिवस
22 मार्च- विश्‍व जल दिवस
23 मार्च – विश्‍व मौसम विज्ञान दिवस
24 मार्च- विश्‍व टीबी दिवस
7 अप्रैल- विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य दिवस
17 अप्रैल- विश्‍व हिमोफिलिया दिवस
18 अप्रैल- विश्‍व विरासत दिवस
22 अप्रैल- पृथ्‍वी दिवस
23 अप्रैल- विश्‍व पुस्‍तक और कॉपीराइट दिवस
1 मई- अंतरराष्‍ट्रीय मजदूर दिवस
3 मई- प्रेस स्‍वतंत्रता दिवस
8 मई- विश्‍व रेडक्रॉस दिवस
12 मई- अंतरराष्‍ट्रीय नर्स दिवस
15 मई- अंतरराष्‍ट्रीय परिवार दिवस
24 मई- राष्‍ट्रमंडल दिवस
31 मई- तंबाकू विरोध दिवस
5 जून- विश्‍व पर्यावरण दिवस
20 जून- जून में तीसरा रविवार- फादर्स दिवस
1 जुलाई- अंतरराष्‍ट्रीय चुटकुला दिवस
11 जुलाई- विश्‍व जनसंख्‍या दिवस
जुलाई का तीसरा रविवार – राष्‍ट्रीय आईसक्रीम दिवस
6 अगस्‍त- हिरोशिमा दिवस
9 अगस्‍त- नगासाकी दिवस
8 सितम्‍बर- विश्‍व साक्षरता दिवस
16 सितम्‍बर- विश्‍व ओजोन दिवस
26 सितम्‍बर- बधिर दिवस
27 सितम्‍बर- विश्‍व पर्यटक दिवस
1 अक्‍टूबर- अंतरराष्‍ट्रीय वृद्ध दिवस
3 अक्‍टूबर- विश्‍व पर्यावास दिवस
4 अक्‍टूबर- विश्‍व पशु कल्‍याण दिवस
12 अक्‍टूबर- विश्‍व दृष्टि दिवस
16 अक्‍टूबर- विश्‍व खाद्य दिवस
24 अक्‍टूबर- संयुक्‍त राष्‍ट्र दिवस
30 अक्‍टूबर- विश्‍व मितव्‍ययता दिवस
14 नवम्‍बर- मधुमेह दिवस
29 नवम्‍बर- फिलीस्‍तीन के लोगों के साथ अंतरराष्‍ट्री एकजुटता दिवस
1 दिसम्‍बर- विश्‍व एड्स दिवस
3 दिसम्‍बर- विश्‍व अक्षमता दिवस
10 दिसम्‍बर- प्रसारण, मानवाधिकार का अंतररा‍ष्‍ट्रीय दिवस

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

यूँ तो नेताजी कब इस दुनिया को छोड़ गये यह आज भी रहस्य बना हुआ है | लेकिन ऐसा मना जाता है कि18 अगस्त या  16 सितम्बर 1945को आजादी के महानायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की पुण्यतिथि है | नेताजी 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में पैदा हुए । उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माँ का नाम प्रभावती देवी था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। उन्होंने कटक की महापालिका में लंबे समय तक काम किया था और बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें रायबहादुर के खिताब से नवाजा था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाषचंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। शरदबाबू प्रभावती और जानकीनाथ के दूसरे बेटे थें। सुभाष उन्हें मेजदा कहते थें।
स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ाव
कोलकाता के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देशबंधु चित्तरंजन दास के कार्य से प्रेरित होकर, सुभाष, दासबाबू के साथ काम करना चाहते थे। इंग्लैंड से उन्होंने दासबाबू को खत लिखकर, उनके साथ काम करने की इच्छा प्रकट की थी। वह रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह पर भारत वापस आए और सर्वप्रथम मुम्बई जा कर महात्मा गाँधी से मिले। मुम्बई में गाँधीजी मणिभवन में निवास करते थे। वहाँ, 20 जुलाई 1921 को महात्मा गाँधी और सुभाषचंद्र बोस के बीच पहली बार मुलाकात हुई। गाँधीजी ने भी उन्हें कोलकाता जाकर दासबाबू के साथ काम करने की सलाह दी। इसके बाद सुभाषबाबू कोलकाता आ गए और दासबाबू से मिले। दासबाबू उन्हें देखकर बहुत खुश हुए। उन दिनों गाँधीजी ने अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन चलाया था। दासबाबू इस आंदोलन का बंगाल में नेतृत्व कर रहे थे। उनके साथ सुभाषबाबू इस आंदोलन में सहभागी हो गए।
1922 में दासबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत स्वराज पार्टी की स्थापना की। विधानसभा के अंदर से अंग्रेज़ सरकार का विरोध करने के लिए, कोलकाता महापालिका का चुनाव स्वराज पार्टी ने लड़कर जीता। स्वयं दासबाबू कोलकाता के महापौर बन गए। उन्होंने सुभाषबाबू को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बनाया। सुभाषबाबू ने अपने कार्यकाल में कोलकाता महापालिका का पूरा ढाँचा और काम करने का तरीका ही बदल डाला। कोलकाता के रास्तों के अंग्रेज़ी नाम बदलकर, उन्हें भारतीय नाम दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम में प्राण न्यौछावर करनेवालों के परिवार के सदस्यों को महापालिका में नौकरी मिलने लगी।
बहुत जल्द ही, सुभाषबाबू देश के एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गए। पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ सुभाषबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकों की इंडिपेंडन्स लिग शुरू की। 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाए। कोलकाता में सुभाषबाबू ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। साइमन कमीशन को जवाब देने के लिए, कांग्रेस ने भारत का भावी संविधान बनाने का काम आठ सदस्यीय आयोग को सौंपा। पंडित मोतीलाल नेहरू इस आयोग के अध्यक्ष और सुभाषबाबू उसके एक सदस्य थे। इस आयोग ने नेहरू रिपोर्ट पेश की।
1928 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कोलकाता में हुआ। इस अधिवेशन में सुभाषबाबू ने खाकी गणवेश धारण करके पंडित मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी। गाँधीजी उन दिनों पूर्ण स्वराज्य की मांग से सहमत नहीं थे। इस अधिवेशन में उन्होंने अंग्रेज़ सरकार से डोमिनियन स्टेटस माँगने की ठान ली थी। लेकिन सुभाषबाबू और पंडित जवाहरलाल नेहरू को पूर्ण स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था। अंत में यह तय किया गया कि अंग्रेज़ सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिए, एक साल का वक्त दिया जाए। अगर एक साल में अंग्रेज़ सरकार ने यह माँग पूरी नहीं की, तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज की मांग करेगी। अंग्रेज़ सरकार ने यह मांग पूरी नहीं की। इसलिए 1930 में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ, तब ऐसा तय किया गया कि 26 जनवरी का दिन स्वतंत्रता दिन के रूप में मनाया जाएगा।
26 जनवरी 1931 के दिन कोलकाता में सुभाषबाबू एक विशाल मोर्चा का नेतृत्व कर रहे थे। तब पुलिस ने उनपर लाठी चलायी और उन्हे घायल कर दिया। जब सुभाषबाबू जेल में थे, तब गाँधीजी ने अंग्रेज सरकार से समझौता किया और सब कैदियों को रिहा किया गया। लेकिन अंग्रेज सरकार ने सरदार भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को रिहा करने से इन्कार कर दिया। भगत सिंह की फाँसी माफ कराने के लिए गाँधीजी ने सरकार से बात की। सुभाषबाबू चाहते थे कि इस विषय पर गाँधीजी अंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझौता तोड़ दें। लेकिन गाँधीजी अपनी ओर से दिया गया वचन तोड़ने को तैयार नहीं थे। अंततः भगत सिंह और उनके साथियों को फाँसी दे दी गयी। भगत सिंह को न बचा पाने के कारण सुभाषबाबू गाँधीजी और कांग्रेस के तौर-तरीकों से बहुत नाराज हो गए।
कारावास
अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाषबाबू को कुल ग्यारह बार कारावास हुआ था। सबसे पहले उन्हें 1921 में छः महिने की जेल हुई।
1925 में गोपिनाथ साहा नामक एक क्रांतिकारी कोलकाता के पुलिस अधीक्षक चार्ल्स टेगार्ट को मारना चाहता था। उसने गलती से अर्नेस्ट डे नामक एक व्यापारी को मार डाला। इसके लिए उसे फाँसी की सजा दे दी गयी। गोपीनाथ को फाँसी होने के बाद सुभाषबाबू जोर से रोये। उन्होने गोपिनाथ का शव माँगकर उसका अंतिम संस्कार किया। इससे अंग्रेज़ों ने यह निष्कर्ष निकाला कि सुभाषबाबू ज्वलंत क्रांतिकारकों से न ही संबंध रखते हैं, बल्कि वे ही उन क्रांतिकारकों के नेता हैं। इसी बहाने अंग्रेज़ सरकार ने सुभाषबाबू को गिरफतार किया और बिना कोई मुकदमा चलाए, उन्हें अनिश्चित काल के लिए म्यांमार के मंडाले कारागृह में बंदी बनाया।
5 नवंबर 1925 को देशबंधू चित्तरंजन दास का कोलकाता में निधन हो गया। सुभाषबाबू ने उनकी मृत्यू की खबर मंडाले जेल में रेडियो पर सुनी। मंडाले कारागृह में रहते समय सुभाषबाबू की तबियत बहुत खराब हो गयी। उन्हें तपेदिक हो जाने के बावजूद अंग्रेज़ सरकार ने रिहा करने से इन्कार कर दिया। सरकार ने उन्हें रिहा करने के लिए यह शर्त रखी की वे इलाज के लिए यूरोप चलें जाए। लेकिन सरकार ने यह तो स्पष्ट नहीं किया था कि इलाज के बाद वे भारत कब लौट सकते हैं। इसलिए सुभाषबाबू ने यह शर्त स्वीकार नहीं की। आखिर में परिस्थिति इतनी कठिन हो गयी की शायद वे कारावास में ही मर जायेंगे। अंग्रेज़ सरकार यह खतरा भी नहीं उठाना चाहती थी, कि सुभाषबाबू की कारागृह में मृत्यु हो जाए। इसलिए सरकार ने उन्हे रिहा कर दिया। फिर सुभाषबाबू इलाज के लिए डलहौजी चले गए।
1930 में कारवास के दौरान ही सुभाषबाबू को कोलकाता का महापौर चुन लिया गया। इसलिए सरकार उन्हें रिहा करने पर मजबूर हो गयी।
1932 में सुभाषबाबू को फिर से कारावास हुआ। इस बार उन्हें अल्मोड़ा जेल में रखा गया। अल्मोड़ा जेल में उनकी तबियत फिर खराब हो गयी। चिकित्सकीय सलाह पर सुभाषबाबू इस बार इलाज के लिए यूरोप जाने को राजी हो गए।यूरोप प्रवास
1933 से 1936 तक सुभाषबाबू यूरोप में रहे। यूरोप में भी आंदोलन कार्य जारी रखा। वहाँ वे इटली के नेता मुसोलिनी से मिले, जिन्होंने उन्हें, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सहायता करने का वचन दिया। आयरलैंड के नेता डी. वॅलेरा सुभाषबाबू के अच्छे दोस्त बन गए।
जब सुभाषबाबू यूरोप में थे, तब पंडित जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू का ऑस्ट्रिया में निधन हो गया। सुभाषबाबू ने वहाँ जाकर पंडित जवाहरलाल नेहरू को सांत्वना दिया।
बाद में सुभाषबाबू यूरोप में विठ्ठल भाई पटेल से मिले। विठ्ठल भाई पटेल के साथ सुभाषबाबू ने पटेल-बोस विश्लेषण प्रसिद्ध किया, जिसमें उन दोनों ने गाँधीजी के नेतृत्व की बहुत निंदा की। बाद में विठ्ठल भाई पटेल बीमार पड गए, तब सुभाषबाबू ने उनकी बहुत सेवा की। मगर विठ्ठल भाई पटेल का निधन हो गया।
विठ्ठल भाई पटेल ने अपनी वसीयत में अपनी करोडों की संपत्ती सुभाषबाबू के नाम कर दी। मगर उनके निधन के पश्चात, उनके भाई सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इस वसीयत को स्वीकार नहीं किया और उस पर अदालत में मुकदमा चलाया। मुकदमा जीतकर पटेल ने सारी संपत्ति गाँधीजी के हरिजन कार्य को भेंट कर दी।
1934 में अपने पिता की मृत्यु की खबर पाकर सुभाषबाबू कोलकाता लौटे। कोलकाता पहुँचते ही अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और कई दिनों तक जेल में रखने के बाद वापस यूरोप भेज दिया।
कांग्रेस का अध्यक्ष पद
सन 1938 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हरिपुरा में होने का तय हुआ था। इस अधिवेशन से पहले गाँधीजी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सुभाषबाबू को चुना। यह कांग्रेस का ५१वां अधिवेशन था। इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष सुभाषबाबू का स्वागत 51 बैलों ने खींचे हुए रथ में किया गया।
इस अधिवेशन में सुभाषबाबू का अध्यक्षीय भाषण बहुत ही प्रभावी हुआ। किसी भी भारतीय राजकीय व्यक्ती ने शायद ही इतना प्रभावी भाषण कभी दिया हो। अपने अध्यक्ष पद के कार्यकाल में सुभाषबाबू ने योजना आयोग की स्थापना की। पंडित जवाहरलाल नेहरू इस के अध्यक्ष थे।
कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा
1938 में गाँधीजी ने कांग्रेस अध्यक्षपद के लिए सुभाषबाबू को चुना तो था, मगर गाँधीजी को सुभाषबाबू की कार्यपद्धति पसंद नहीं आयी। इसी दौरान यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल छा गए थे। सुभाषबाबू चाहते थे कि इंग्लैंड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर, भारत का स्वतंत्रता संग्राम अधिक तीव्र किया जाए। हालांकि, गाँधीजी उनके इस विचार से सहमत नहीं थे।
1939 में जब नया कांग्रेस अध्यक्ष चुनने का वक्त आया, तब सुभाषबाबू चाहते थे कि कोई ऐसी व्यक्ति अध्यक्ष बन जाए, जो इस मामले में किसी दबाव के सामने न झुके। ऐसा कोई दूसरा व्यक्ति सामने न आने पर सुभाषबाबू ने खुद कांग्रेस अध्यक्ष पर बने रहना चाहा। लेकिन गाँधीजी अब उन्हें अध्यक्ष पद से हटाना चाहते थे। गाँधीजी ने अध्यक्षपद के लिए पट्टाभी सीतारमैय्या को चुना। रविंद्रनाथ ठाकुर ने गाँधीजी को पत्र लिखकर सुभाषबाबू को ही अध्यक्ष बनाने का निवेदन किया। प्रफुल्लचंद्र राय और मेघनाद सहा जैसे वैज्ञानिक भी सुभाषबाबू को फिर से अध्यक्ष के रूप में देखना चाहतें थे। लेकिन गाँधीजी ने इस मामले में किसी की बात नहीं मानी। कोई समझौता न हो पाने के कारण कई वर्षों बाद पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुआ।
सब यही जानता थे कि महात्मा गाँधी ने पट्टाभी सितारमैय्या का साथ दिया है इसलिए वह चुनाव आसानी से जीत जाएंगे। लेकिन वास्तव में हुआ इसके ठीक विपरीत, सुभाषबाबू को चुनाव में 1580 मत मिले जबकि पट्टाभी सीतारमैय्या को 1377 मत मिले। गाँधीजी के विरोध के बावजूद सुभाषबाबू 203 मतों से यह चुनाव जीत गए।
मगर, बात यहीं खत्म नहीं हुई। गाँधीजी ने पट्टाभी सीतारमैय्या की हार को अपनी हार बताकर अपने साथियों से कह दिया कि अगर वें सुभाषबाबू की कार्यपद्धति से सहमत नहीं हैं तो वें कांग्रेस से हट सकतें हैं। इसके बाद कांग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू तटस्थ रहे और अकेले शरदबाबू सुभाषबाबू के साथ बने रहे।
1939 का वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन त्रिपुरी में हुआ। इस अधिवेशन के समय सुभाषबाबू तेज बुखार से इतने बीमार पड़ गए थे, कि उन्हें स्ट्रेचर पर लेटकर अधिवेशन में आना पडा। गाँधीजी इस अधिवेशन में उपस्थित नहीं रहे। गाँधीजी के साथियों ने सुभाषबाबू से बिल्कुल सहकार्य नहीं दिया।
अधिवेशन के बाद सुभाषबाबू ने समझौते के लिए बहुत कोशिश की। लेकिन गाँधीजी और उनके साथियों ने उनकी एक न मानी। परिस्थिति ऐसी बन गयी कि सुभाषबाबू कुछ काम ही न कर पाए। आखिर में तंग आकर 29 अप्रैल 1939 को सुभाषबाबू ने कांग्रेस अध्यक्षपद से इस्तीफा दे दिया।
फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना
3 मई 1939 को सुभाषबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। कुछ दिन बाद सुभाषबाबू को कांग्रेस से निकाल दिया गया। बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप एक स्वतंत्र पार्टी बन गयी।
द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले से ही फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्वतंत्रता संग्राम अधिक तीव्र करने के लिए जनजागरण शुरू कर दिया। इसलिए अंग्रेज सरकार ने सुभाषबाबू सहित फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी मुख्य नेताओ को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सुभाषबाबू जेल में निष्क्रिय रहना नहीं चाहते थे। सरकार को उन्हें रिहा करने पर मजबूर करने के लिए सुभाषबाबू ने जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। मजबूर होकर सरकार को उन्हें रिहा करना पड़ा। मगर अंग्रेज सरकार यह नहीं चाहती थी कि सुभाषबाबू युद्ध के दौरान मुक्त रहें। इसलिए सरकार ने उन्हें उनके ही घर में नजरबंद कर दिया।
नजरबंदी से पलायन
नजरबंदी से निकलने के लिए सुभाषबाबू ने एक योजना बनायी। 16 जनवरी 1941 को वे पुलिस को चकमा देने के लिये एक पठान मोहम्मद जियाउद्दीन का भेष धरकर घर से भाग निकले। शरदबाबू के बडे़ बेटे शिशिर ने उन्हें अपनी गाड़ी से कोलकाता से दूर गोमोह तक पहुँचाया। गोमोह रेलवे स्टेशन से फ्रंटियर मेल पकड़कर वे पेशावर पहुँचे। पेशावर में उन्हे फॉरवर्ड ब्लॉक के एक सहकारी मियां अकबर शाह मिले। मियां अकबर ने उनकी मुलाकात कीर्ती किसान पार्टी के भगतराम तलवार से कराई। भगतराम तलवार के साथ में सुभाषबाबू पेशावर से अफ़्ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल की ओर निकल पडे़। इस सफर में भगतराम तलवार, रहमतखान नाम के पठान बने थे और सुभाषबाबू उनके गूंगे-बहरे चाचा बने थे।
काबुल में सुभाषबाबू दो महिनों तक उत्तमचंद मल्होत्रा नामक एक भारतीय व्यापारी के घर में रहे। वहाँ उन्होंने पहले रूसी दूतावास में प्रवेश पाना चाहा। इस में नाकामयाब रहने पर उन्होंने जर्मन और इटालियन दूतावासों में प्रवेश पाने की कोशिश की। इटालियन दूतावास में उनकी कोशिश सफल रही। जर्मन और इटालियन दूतावासों ने उनकी सहायता की। आखिर में ओर्लांदो मात्सुता नामक इटालियन व्यक्ति बनकर सुभाषबाबू काबुल से निकलकर रूस की राजधानी मॉस्को होते हुए जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुँच गए।
हिटलर से मुलाकात
उन्होंने जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडिओ की स्थापना की। इसी दौरान सुभाषबाबू नेताजी नाम से जाने जाने लगे। जर्मन सरकार के एक मंत्री एडॅम फॉन ट्रॉट सुभाषबाबू के अच्छे दोस्त बन गए।
आखिर, 29 मई 1942 को सुभाषबाबू जर्मनी के सर्वोच्च नेता एडॉल्फ हिटलर से मिले। लेकिन हिटलर को भारत के विषय में विशेष रूचि नहीं थी। उन्होंने सुभाषबाबू को सहायता का कोई स्पष्ट वचन नहीं दिया।
कई साल पहले हिटलर ने माईन काम्फ नामक अपना आत्मचरित्र लिखा था। इस किताब में उन्होंने भारत और भारतीय लोगों की बुराई की थी। इस विषय पर सुभाषबाबू ने हिटलर से अपनी नाराजी व्यक्त की। हिटलर ने अपने किये पर माँफी माँगी और माईन काम्फ की अगली आवृत्ति से वह परिच्छेद निकालने का वचन दिया।
अंत में, सुभाषबाबू को पता चला कि हिटलर और जर्मनी से उन्हें कुछ और नहीं मिलनेवाला हैं। इसलिए 8 मार्च 1943 को जर्मनी के कील बंदर में अपने साथी आबिद हसन सफरानी के साथ एक जर्मन पनडुब्बी में बैठकर पूर्व आशिया की तरफ निकल गए। यह जर्मन पनदुब्बी उन्हे हिंद महासागर में मादागास्कर के किनारे तक लेकर आई। वहाँ वे दोनो खूँखार समुद्र में से तैरकर जापानी पनडुब्बी तक पहुँच गए। यह जापानी पनदुब्बी उन्हे इंडोनेशिया के पादांग बंदर तक लेकर आई।
पूर्व एशिया में अभियान
पूर्व एशिया पहुँचकर सुभाषबाबू ने सर्वप्रथम वयोवृद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस से भारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सँभाला। सिंगापुर के फरेर पार्क में रासबिहारी बोस ने भारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सुभाषबाबू को सौंप दिया।
जापान के प्रधानमंत्री जनरल हिदेकी तोजो ने नेताजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्हें सहकार्य करने का आश्वासन दिया। कई दिनों पश्चात नेताजी ने जापान की संसद डायट के सामने भाषण किया।
21 अक्तूबर 1943 को नेताजी ने सिंगापुर में अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) की स्थापना की। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री बने। इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गए। आज़ाद हिन्द फौज में जापानी सेना ने अंग्रेजों की फौज से पकडे़ हुए भारतीय युद्धबंदियोंको भर्ती किया। आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतों के लिए झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी।
पूर्व एशिया में नेताजी ने जगह-जगह भाषण करके वहाँ भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भर्ती होने और उसे आर्थिक मदद करने का आह्वान किया। उन्होंने अपने आह्वान में संदेश दिया- तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया। अपनी फौज को प्रेरित करने के लिए नेताजी ने चलो दिल्ली का नारा दिया। दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिए। नेताजी ने इन द्वीपों का नाम शहीद और स्वराज द्वीप रखा। दोनो फौजो ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया। लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और दोनो फौजो को पीछे हटना पड़ा।
जब आज़ाद हिन्द फौज पीछे हट रही थी, तब जापानी सेना ने नेताजी के भाग जाने की व्यवस्था की। परंतु नेताजी ने झाँसी की रानी रेजिमेंट की लड़कियों के साथ सैकडों मिल चलते जाना पसंद किया। इस प्रकार नेताजी ने सच्चे नेतृत्व का एक आदर्श ही बनाकर रखा।
6 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद रेडियो पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधीजी से बात करते हुए, नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद तथा आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्देश्य के बारे में बताया। इस भाषण के दौरान नेताजी ने गाँधीजी को राष्ट्रपिता का संबोधन कर अपनी जंग के लिए उनका आशिर्वाद माँगा। इस प्रकार नेताजी ने गाँधीजी को सर्वप्रथम राष्ट्रपिता बुलाया।
मृत्यु का अनुत्तरित रहस्य
द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था। उन्होंने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया था। 18 अगस्त 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मांचुरिया की तरफ जा रहे थे। इस सफर के के बाद से ही उनका कुछ भी पता नहीं चला।
23 अगस्त 1945 को जापान की दोमेई समाचार संस्था ने बताया कि 18 अगस्त को नेताजी का हवाई जहाज ताइवान की भूमि पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और उस दुर्घटना में बुरी तरह से घायल होकर नेताजी ने अस्पताल में अंतिम साँस ली।
दुर्घटनाग्रस्त हवाई जहाज में नेताजी के साथ उनके सहकारी कर्नल हबिबूर रहमान थे। उन्होने नेताजी को बचाने का निश्चय किया, लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके। फिर नेताजी की अस्थियाँ जापान की राजधानी टोकियो में रेनकोजी नामक बौद्ध मंदिर में रखी गयी।
स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार ने इस घटना की जाँच करने के लिए 1956 और 1977 में दो बार आयोग का गठन किया। दोनों बार यह नतीजा निकला कि नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही मारे गये थे। लेकिन जिस ताइवान की भूमि पर यह दुर्घटना होने की खबर थी, उस ताइवान देश की सरकार से, इन दोनो आयोगो ने बात ही नहीं की।
1999 में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग बनाया गया। 2005 में ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बता दिया कि 1945 में ताइवान की भूमि पर कोई हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था। 2005 में मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश की, जिस में उन्होंने कहा कि नेताजी की मृत्यु, उस विमान दुर्घटना में होने का कोई सबूत नहीं हैं। लेकिन भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया।