31.10.12

जन गण मन की कहानी-कितना सच कितना झूठ-क्या होना चाहिए आपका राष्ट्रगान
रविन्द्र नाथ टेगोर ने अपने ICS ऑफिसर बहनोई को भेजे एक पत्र में लिखा था कि 'जन गण मन' गीत मुझसे अंग्रेजो के दबाव में लिखवाया है. यह में अंग्रेजों के राजा जॉर्ज पंचम की खुशामद में लिखा गया है, इसके शब्दों का अर्थ देश के स्वाभिमान को चोट पहुंचाता है. इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है. सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था. सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया. पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये. इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया. रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा.

उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे. उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था. और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए. रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता". इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था.

इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है "भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है. हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो. तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महाराष्ट्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित हैं, खुश हैं, प्रसन्न हैं , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है. तुम्हारी ही हम गाथा गाते है. हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो. "

जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया. जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया. क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है. जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की. वह बहुत खुश हुआ. उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये. रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए. जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था.

उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया. तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया. क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था. टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है. जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया.

रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली. इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया. सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे.

रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे. अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) . इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है. इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है. इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है. लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे. 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये.

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी. लेकिन वह दो खेमो में बट गई. जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे. मतभेद था सरकार बनाने को लेकर. मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने. जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है. इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया. कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए. एक नरम दल और एक गरम दल.

गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी. वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे. और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे). लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे. उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना. हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे. वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी. नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम दल वाले "वन्दे मातरम".

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है. और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है. उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे. उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया. जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली. संविधान सभा की बहस चली. संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई.

बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना. और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु. उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी). अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास. गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये. तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा". लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए.

नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है. उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया. नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था.

बीबीसी ने एक सर्वे किया था. उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम. बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है. कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है.

तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का. अब ये आप को तय करना है कि देश का राष्ट्र गान क्या होना चाहिए और क्या नहीं.
जन गण मन की कहानी-कितना सच कितना झूठ-क्या होना चाहिए आपका राष्ट्रगान
रविन्द्र नाथ टेगोर ने अपने ICS ऑफिसर बहनोई को भेजे एक पत्र में लिखा था कि 'जन गण मन' गीत मुझसे अंग्रेजो के दबाव में लिखवाया है. यह में अंग्रेजों के राजा जॉर्ज पंचम की खुशामद में लिखा गया है, इसके शब्दों का अर्थ देश के स्वाभिमान को चोट पहुंचाता है. इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है.

सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था. सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया. पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये. इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया. रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा.

उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे. उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था. और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए. रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता". इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था.

इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है "भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है. हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो. तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महाराष्ट्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित हैं, खुश हैं, प्रसन्न हैं , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है. तुम्हारी ही हम गाथा गाते है. हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो. "

जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया. जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया. क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है. जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की. वह बहुत खुश हुआ. उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये. रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए. जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था.

उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया. तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया. क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था. टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है. जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया.

रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली. इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया. सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे.

रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे. अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) . इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है. इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है. इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है. लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे. 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये.

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी. लेकिन वह दो खेमो में बट गई. जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे. मतभेद था सरकार बनाने को लेकर. मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने. जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है. इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया. कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए. एक नरम दल और एक गरम दल.

गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी. वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे. और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे). लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे. उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना. हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे. वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी. नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम दल वाले "वन्दे मातरम".

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है. और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है. उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे. उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया. जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली. संविधान सभा की बहस चली. संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई.

बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना. और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु. उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी). अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास. गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये. तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा". लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए.

नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है. उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया. नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था.

बीबीसी ने एक सर्वे किया था. उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम. बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है. कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है.

तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का. अब ये आप को तय करना है कि देश का राष्ट्र गान क्या होना चाहिए और क्या नहीं.
जन गण मन की कहानी-कितना सच कितना झूठ-क्या होना चाहिए आपका राष्ट्रगान
रविन्द्र नाथ टेगोर ने अपने ICS ऑफिसर बहनोई को भेजे एक पत्र में लिखा था कि 'जन गण मन' गीत मुझसे अंग्रेजो के दबाव में लिखवाया है. यह में अंग्रेजों के राजा जॉर्ज पंचम की खुशामद में लिखा गया है, इसके शब्दों का अर्थ देश के स्वाभिमान को चोट पहुंचाता है. इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है.

सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था. सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया. पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये. इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया. रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा.

उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे. उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था. और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए. रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता". इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था.

इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है "भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है. हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो. तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महाराष्ट्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित हैं, खुश हैं, प्रसन्न हैं , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है. तुम्हारी ही हम गाथा गाते है. हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो. "

जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया. जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया. क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है. जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की. वह बहुत खुश हुआ. उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये. रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए. जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था.

उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया. तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया. क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था. टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है. जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया.

रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली. इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया. सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे.

रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे. अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) . इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है. इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है. इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है. लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे. 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये.

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी. लेकिन वह दो खेमो में बट गई. जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे. मतभेद था सरकार बनाने को लेकर. मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने. जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है. इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया. कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए. एक नरम दल और एक गरम दल.

गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी. वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे. और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे). लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे. उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना. हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे. वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी. नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम दल वाले "वन्दे मातरम".

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है. और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है. उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे. उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया. जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली. संविधान सभा की बहस चली. संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई.

बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना. और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु. उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी). अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास. गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये. तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा". लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए.

नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है. उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया. नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था.

बीबीसी ने एक सर्वे किया था. उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम. बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है. कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है.

तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का. अब ये आप को तय करना है कि देश का राष्ट्र गान क्या होना चाहिए और क्या नहीं.
भ्रष्ट कांग्रेस बेंच रही देश: विलासराव देशमुख और अहमद पटेल का पैसा भी स्विस बैंक में, क्या सोनिया भी शामिल!
इतिहास गवाह है कि जब-जब कांग्रेस बौखलायी है उसे बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी है। चाहे वह आजादी के बाद जनता की आवाज दबाने के लिए इमरजेंसी लगाने का मामला हो या फिर बोफोर्स घोटाले के उजागर होने के बाद की स्थिति। इन दोनों मामलों में उसने पावर दिखाने की कोशिश की और दोनों दफा पावरलेस (सत्ताच्युत) होना पड़ा।

आखिर हो क्या गया है कांग्रेस को? वह असंयमित व असहज क्यों है? उनके नेता आपा खोते नजर क्यों आ रहे हैं? क्या जाने-अनजाने किसी ने उसकी कमजोर नस पकड़ ली है? और अगर ऐसा है तो फिर क्यों नहीं वह खुद को उससे छुड़ा पा रही है? क्या किसी अनहोनी का डर है? ये ऐसे कुछ सवाल हैं जिसका जवाब फिलहाल न तो आपके पास है और न ही मेरे पास। हां, इससे जुडे कुछ क्लू जरूर हैं। अब आप पर निर्भर करता है कि उन्हें आपस में जोडकर आप कहां तक पहुंच पाते हैं?

इमरजेंसी वाले मामले को तो कांग्रेस खुद सबसे बड़ी भूल मान रही है जबकि बोफोर्स मामले पर लीपापोती करती रही है। कांग्रेस इसे स्वीकार करने से बचती रही है। बचे भी क्यों नहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी पर कमीशन खाने के सीधे-सीधे आरोप जो लगे थे। इसके पक्ष में कई सबूत भी पेश किये गये थे। हालांकि मौजूदा कांग्रेस तो इससे भी बदतर स्थिति से गुजर रही है। कांग्रेस की राजीव सरकार को तो केवल बोफोर्स कांड लेकर डूब गयी थी जबकि अभी की सरकार पर तो बोफोर्स से काफी बडे़-बडे़ मामले (भ्रष्टाचार) 2जी स्पेक्ट्रम (1 लाख 76 हजार करोड़) , कामनवेल्थ गेम्स (17,600 करोड़), विदेशों में जमा काला धन (70 लाख करोड़) हैं। इन मामलों में कांग्रेस व उनके सहयोगी दलों के कई नेता सलाखों के पीछे जा चुके हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व उनके सिपहसलारों का नाम भी आ रहा है। काला धन जमा कराने वालों में केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख और सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल का भी नाम आया है। स्विस बैंकों में पैसा जमा करने वाले माफिया हसन अली से इनके गहरे रिश्ते के बारे में भी पता चला है।

आइये इन संबंधों को समझने के लिए कुछ आंकड़ों पर नजर डालते हैं। एक रिपोर्ट की मानें तो स्विट्‌जरलैंड में भारतीयों का 70 लाख करोड़ रुपया पड़ा हुआ है। यह वहां सालों से पड़ा है। स्विट्जरलैंड के एक अख़बार इलस्ट्रेटेड ने तो दुनिया के 14 बड़े लोगों का ज़िक्र उनकी तस्वीरों के साथ बहुत पहले ही कर दिया था। इनमें हिंदुस्तान के एक व्यक्ति का भी नाम है। आप जानना चाहेंगे नाम। वह हिंदुस्तानी हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। उनकी तस्वीर के बाजू में कई मिलियन डॉलर लिखे हुए थे। कहा तो यहां तक जा रहा है कि यह हाईलेवल गोरखधंधा इतना फला-फूला कि इन विदेशी बैंकों को अपने यहां ही बुला लिया। पहले चोरी करके (काला धन) स्विट्‌ज़रलैंड भेजते थे, अब इन बैंकों को भारत ही बुला लिया गया। 2005 में स्विट्‌ज़रलैंड के चार बैंक यहीं बुला लिए। स्विट्‌ज़रलैंड ले जाने में जो दिक्क़त 97 होती थी उसका भी निदान हो गया। लेकिन स्विट्‌ज़रलैंड के साथ-साथ आठ बैंक इटली के लाए गये।

सवाल उठता है कि इटली के आठ बैंक भारत में क्या कर रहे हैं? कहा जा रहा है कि ये इटली के वे बैंक हैं, जो घाटे में चल रहे हैं और जिन्हें वहां का मा़फिया चला रहा है। हसन अली के मामले में पिछले दिनों जो कुछ हुआ आप इससे वाकिफ होंगे ही। सब कुछ साफ हो जाने के बाद भी राजनीतिक रिश्ते की वजह से वह छुट्टे सांड की तरह घूम रहा था। उसकी गिरफ्तारी तक का साहस नहीं जुटाया जा पा रहा था। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद ही केंद्र सरकार हरकत में आयी। सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार से पूछा कि हसन अली के ख़िला़फ अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। हालांकि अब फिर वह रिहा कर दिया गया है क्योंकि जांच एजेंसी उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर सकी। समझ में नहीं आता कि इतना सब कुछ होने के बाद भी आखिर कैसे सबूत जुटाया नहीं जा सका। इस आधार पर तो जांच एजेंसी की कार्य क्षमता पर ही सवाल उठता है लेकिन ऐसा नहीं होगा क्योंकि यहां यह जुमला फिट बैठता है कि मुंसिफ ही कातिल तो डर काहे का। आप समझदार हैं, समझ गये होंगे।

चलिए कुछ और खंगालते हैं। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के पास क्या कुछ नहीं है। उसने पुणे में हसन अली के यहां छापा मारा था। छापे में एक लैपटॉप पकड़ा गया था जिसमें सत्रह नाम थे। एक नाम पढ़ा जा सकता था अदनान खशोगी का, बाक़ी सोलह नाम कोडेड थे, समझ नहीं आ रहे थे। आईटी अ़फसर थक गए। उन्होंने हाथ खडे़ कर दिये। स्विट्‌जरलैंड को चिट्ठी लिखी गयी कि इनके नाम बता दीजिए। उनकी तरफ से जवाब आया कि हम ये नाम आपको देने के लिए तैयार हैं, अगर आपके वित्तमंत्री हमें चिट्ठी लिखें। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने वित्तमंत्री चिदंबरम से संपर्क किया और उनहोंने तत्काल पत्र लिख भी दिया। उनके पास सत्रह आदमियों की लिस्ट आ गयी लेकिन उस लिस्ट को देखने के बाद मानों उन्हें सांप सूंघ लिया हो। आनाकानी करने लगे क्योंकि उसमें तीन राजनेताओं के भी नाम थे। एक विलासराव देशमुख का नाम था, जो कैबिनेट मंत्री है। उसके बाद घोड़े के व्यवसायी हसन अली का नाम आया, जिसके खाते में 100 लाख करोड़ रुपया जमा था। तीसरा नाम अहमद पटेल का है। जी हां, सोनिया जी के राजनीतिक सलाहकार। विलासराव देशमुख के साथ हसन अली से मिलने पहले वह जाया करते थे। बॉम्बे पुलिस के पास उन तीनों राजनेताओं की वीडियो फुटेज है, जो रात को पुणे में मिलते थे। अब आप हसन अली से सोनिया गांधी तक इन क्लू के जरिये कैसे पहुंचते हो यह आप पर निर्भर करता है।

लीजिए एक और क्लू देते हैं और समझ-बूझकर आपस में इसे जोडिए। क्वात्रोची का नाम तो आपको याद होगा। किस तरह उन्होंने बोफोर्स मामले में देश को चूना लगाया। यह भी जानते होंगे ही कि उनके सोनिया जी से क्या संबंध थे। हालांकि उस समय इसको लेकर खूब बावेला मचा पर क्वात्रोची लापता हो गये। लेकिन यह जानकर आपको आश्‍चर्य होगा कि क्वात्रोची का बेटा तब भी सक्रिय रहा। उसके बेटे को 2005 में अंडमान निकोबार में तेल की खुदाई का ठेका तक मिला। इटली की कंपनी ईएनआई इंडिया लिमिटेड के नाम से खोला गया। उसके बेटे का दफ्तर मेरिडियन होटल के अंदर आज भी है। अब अगली किश्त का इंतजार करें। तब तक जुट जाइये इसे आपस में जोड़ने के लिए।

लेख- कुमार समीर

(लेखक कुमार समीर पिछले दो दशक से ज्‍यादा समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. प्रिंट एवं इलेक्‍ट्रानिक में समान पकड़ रखने वाले कुमार समीर सहारा समेत कई बड़े संस्‍थानों के हिस्‍सा रह चुके हैं.)
http://www.mpsamachar.com/news.asp?key=186,bottspecial

28.10.12

थाईलैंड में 'सुंदर' होने की कीमत

 सोमवार, 29 अक्तूबर, 2012 को 07:23 IST तक के समाचार

थाई महिलाएं
क्रेटाए पर अपने माता पिता और भाई बहनों की जिम्मेदारी थी
थाईलैंड में सुंदर महिलाओं के लिए काम की कोई कमी नहीं है. वो वॉशिंग पाउडर से लेकर लग्ज़री कार तक को पेश करती हैं और ग्राहक इन उत्पादों की तरफ खिंचे चले आते हैं.
इस काम में पैसे भी काफी हैं लेकिन हमेशा सुंदर दिखने की चुनौती भी है जो अकसर "प्रेटीज" यानी सुंदरियां कहलाने वाले वाली इन महिलाओं के लिए बहुत महंगी पड़ती है.
32 वर्षीय अथितिया ईयामायी उस उम्र में पहुंच गईं थी, जब बहुत सी सुंदरियां दूसरा काम तलाशना शुरू कर देती हैं. लेकिन अथितिया या क्रेटाए (इसी नाम से लोग उन्हें ज्यादा जानते थे) के लिए 100 डॉलर यानी 6 हजार रुपये प्रति दिन का काम छोड़ना आसान नहीं था. उन पर न सिर्फ अपने माता पिता और बल्कि भाई बहनों की भी जिम्मेदारी थी.
क्रेटाए ने अपने रंग रूप और चेहरे को संवारने के लिए पहले भी हजारों डॉलर खर्च किए थे. उन्होंने कई सर्जरियां कराईं. अपनी नाक को बदलवाया, अपने जबड़े को संकरा कराया और अपने स्तनों का आकार बढ़वाया.

दर्दभरी सुंदरता

"बहुत से लोग जिन्होंने डॉक्टरों के साथ काम किया है, वो कॉस्मेटिक सर्जरी करने लग जाते हैं जो गैर कानूनी है."
डॉ. जिंदा रोजानामाटिन, सरकारी डॉक्टर
लेकिन क्रेटाए की दोस्त और एक अन्य सुंदरी पिम सायसानार्द बताती हैं कि वो खुश नहीं थी.
वो कहती हैं, “क्रेटाए कहा करती थी कि अगर आपको सुंदर बनना है तो इसके लिए दर्द सहना होगा. वो बड़े कूल्हे चाहती थी ताकि वो उसके बड़े स्तनों के अनुरूप हो. वो कहती थी कि वो खुद को परिपूर्ण बनाएगी.”
कूल्हों का आकार बढ़ाने के दो तरीके हैं. ज्यादातर प्लास्टिक सर्जन सलाह देते हैं कि अपने पेट की चर्बी को कूल्हों में लगवा लिया जाए. चूंकि क्रेटाए बहुत दुबली थीं वो इस तरीके को नहीं अपना सकती थी.
उन्होंने दूसरा तरीका चुना जिसमें कृत्रिम पदार्थों यानी ‘फिलर्स’ को कूल्हों में भरा जाता है.
ये फिलर सस्ते नहीं होते हैं. सर्जरी के लिए सबसे सस्ती जगहों में से एक होने के बावजूद बैंकॉक में इनकी कीमत 80,000 बाहत यानी एक लाख चालीस हजार रुपये होती है. लेकिन क्रेटाए की दोस्त ने उनका परिचय एक व्यक्ति थानात नत्वीराकुल से कराया जो खुद को डॉ. पॉप कहते हैं.

महंगी पड़ी सस्ती सर्जरी

थाईलैंड में होने वाले अंतरराष्ट्रीय मेलों, प्रदर्शनियों और प्रॉडक्ट लॉन्च जैसे आयोजनो में इन युवतियों की खूब मांग रहती है
डॉ पॉप कोई डॉक्टर नहीं हैं और कॉस्मेटिक सर्जरी का उनका अनुभव भी बहुत सीमित है. क्रेटाए आधी कीमत यानी 40,000 बाहत में डॉ. पॉप से सर्जरी कराने के लिए समहत हो गईं.
ये साफ नहीं है कि सर्जरी के दौरान कहां गड़बड़ी हुई लेकिन क्रेटाए को फिलर लगाने के बाद ही सांस लेने में दिक्कत होने लगी.
हो सकता है कि डॉ. पॉप ने चर्बी वाले ऊतक तलाशने की बजाय क्रेटाए की धमकियों में फिलर को लगा दिया. इसके बाद वो जेल रूपी पदार्थ उनके फेंफड़ों तक पहुंच गया और जमा लगा जिससे मस्तिष्क में ऑक्सीजन पहुंचनी बंद हो गई.
अफरातफरी में डॉ. पॉप ने क्रेटाए को अस्पताल पहुंचाया जहां वो कोमा में चली गईं और कभी नहीं उठीं. तीन हफ्ते बाद उनकी मौत हो गई.

कितनी अहम है सुंदरता

एलिसा फियाबून्नांतानपोंग भी सुंदरता से चलने वाले इसी पेशे में हैं. वो मानती हैं कि क्रेटाए की सिर्फ किस्मत खराब थी, वरना कितने लोग इस तरह की सस्ती सर्जरी कराते हैं.
"अगर एक सुंदरी कोई खास सर्जरी कराती हैं तो बाकी भी वैसा ही कराती हैं. अगर आप सर्जरी नहीं कराती हैं तो आप बाकियों से अलग दिखती हैं और आपको कोई काम नहीं मिलता."
पिम साइसानर्द, एक सुंदरी
एलिसा कई सर्जरी करा चुकी हैं. उन्होंने 25 साल की उम्र में अपने आठ दांत निकलवाए ताकि उनके जबड़े को सही आकार दिया जा सके.
सुंदरियों को काम ज्यादातर निजी सिफारिश पर मिलता है. ऐसे बाकी सुंदरियों के संपर्क में रहना बहुत अहम होता है.
पिम साइसानर्द कहती हैं, “अगर एक सुंदरी कोई खास सर्जरी कराती हैं तो बाकी भी वैसा ही कराती हैं. अगर आप सर्जरी नहीं कराती हैं तो आप बाकियों से अलग दिखती हैं और आपको कोई काम नहीं मिलता.”
ये बात सही है कि सारी गैर कानूनी सर्जरी नाकाम नहीं रहती हैं, लेकिन जब ऐसा कुछ होता है तो क्रेटाए जैसे दर्दनाक मामले सामने आते हैं.

भ्रष्टाचार

बैकॉक के एक निजी अस्पताल में काम करने वाले डॉ. थेप वेचाविसिट का कहना है कि उनके ऐसे बहुत से लोग आ रहे हैं जो सर्जरी के जरिए अपने रंग रूप और चेहरे को संवारना चाहते हैं.
थाई महिला
एलिसा कई बार सर्जरी करा चुकी हैं
वो बढ़ती गैर कानूनी सर्जरियों की वजह भ्रष्टाचार को बताते हैं. डॉ. वेचाविसिट का कहना है कि ऐसी सर्जरी करने वाले लोगों की पुलिस से मिलीभगत होती है. उन्हें रिश्वत दी जाती है और वो ऐसे लोगों पर कार्रवाई नहीं करते हैं.
एक सरकारी अस्पताल में त्वचा विभाग के निदेशक डॉ. जिंदा रोजानामाटिन बताते हैं, “बहुत से लोग जिन्होंने डॉक्टरों के साथ काम किया है, वो कॉस्मेटिक सर्जरी करने लग जाते हैं जो गैर कानूनी है.”
डॉ. रोजानामाटिन कहते हैं कि जन स्वास्थ्य मंत्रालय इस समस्या से अवगत है लेकिन इससे निपटने के लिए उनके पास लोग ही नहीं हैं.
क्रेटाए की मौत की मीडिया में खूब चर्चा हुई जिसके बाद डॉ. पॉप को गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें 13 साल की कैद और 50 हजार बाहत तक का जुर्माना हो सकता है.

जो आप जानना चाहेंगे अमरीकी राष्ट्रपतियों के बारे में

 सोमवार, 29 अक्तूबर, 2012 को 08:29 IST तक के समाचार

अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों की दिलचस्प बातें.
अमरीका के 26 राष्ट्रपति पेशे से वकील रहे हैं.
अमरीका में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों में पूरी दुनिया की दिलचस्पी होती है. लेकिन अगर इतिहास के खंगालें तो अमरीकी राष्ट्रपतियों से जुड़ी कई रोचक बातें सामने आती हैं.
पता चलता है कि कौन से अमरीकी राष्ट्रपति कुंवारे रहे, किसके सबसे ज्यादा बच्चे थे, कौन कौन राष्ट्रपति कॉलेज नहीं गए और कौन से राष्ट्रपति सिर्फ एक महीने ही पद पर रहे. चलिए जानते हैं:

इतिहास के झरोखे से

बराक ओबामा अमरीका के 44वें राष्ट्रपति हैं. लेकिन गिनती की जाए, तो कुल 43 ही राष्ट्रपति हुए हैं. दरअसल क्लीवलैंड को दो बार राष्ट्रपति चुना गया, लेकिन वो लगातार आठ वर्ष रहने की बजाय दो अलग अलग कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति रहे. एक बार वो 1885 से 1889 तक तो दूसरी बार 1893 से 1897 तक राष्ट्रपति रहे. इसलिए उन्हें दो बार गिना जाता है.
अमरीकी इतिहास में आठ राष्ट्रपति ऐसे रहे जो ब्रितानी प्रजा थे. ये राष्ट्रपति थे जॉर्ज वॉशिंगटन, जे एडम्स, थॉमस जेफरसन, जेम्स मेडसन, जेम्स मोनरोय, जेक्यू एडम्स, एंड्रयू जैक्सन और डब्ल्यू हैरिसन.
नौ अमरीकी राष्ट्रपति कभी कॉलेज ही नहीं गए जिनके नाम इस प्रकार है: जॉर्ज वॉशिंगटन, एंड्रयू जैक्सन, फान बरेन, जेड. टेलर, मिलार्ड फिमोरे, अब्राहम लिकंन, ए, जॉनसन, क्लीवलैंड औऱ ट्रुमैन.
अमरीका के 42 राष्ट्रपतियों के पूर्वज डच, इंगलिश, आयरिश, स्टॉटिश, वेल्श, स्विस या जर्मन ही थे.
बराक ओबामा अमरीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति हैं. उनका जन्म हवाई में हुआ था. इस तरह वो पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं जिनका जन्म अमरीकी महाद्वीप पर नहीं हुआ था.
सबसे ज्यादा उम्र (69 वर्ष) में अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव जीतने का कीर्तिमान रोनाल्ड रीगन के नाम है. वहीं जॉन एफ कैनेडी राष्ट्रपति चुनाव जीतने वाले सबसे युवा उम्मीदवार थे. उस वक्त उनकी उम्र 43 साल थी.
हालांकि सबसे कम उम्र में राष्ट्रपति संभाले वाले राष्ट्रपति थियोडोर रुज़वेल्ट रहे जिन्होंने राष्ट्रपति मैककिनली की हत्या के बाद उनके उत्तराधिकारी के तौर पर सत्ता संभाली.
सबसे ज्यादा समय तक जीवित रहने वाले पूर्व राष्ट्रपति जेराल्ड फोर्ड थे जिनका जन्म 14 जुलाई, 1913 को हुआ और निधन 93 वर्ष की आयु में 27 दिसंबर 2006 को हुआ. रोनाल्ड रीगन भी 93 वर्ष तक ही जीवित रहे.
सबसे लंबे राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन थे जिनका कद छह फीट और चार इंच था जबकि सबसे छोटे कद के राष्ट्रपति मैडिसन थे जो 5 फुट 4 इंच के थे.
अमरीका के आठ राष्ट्रपति बाएं हाथ से लिखने वाले रहे हैं. उनके नाम हैं: जेम्स ए. गारफील्ड, हैर्बर्ट हूवर, हैरी एस, ट्रुमैन, जेराल्ड फोर्ड, रोनाल्ड रीगन, जॉर्ज बुश (सीनियर), बिल क्लिंटन और बराक ओबामा.
अमरीका के 14 राष्ट्रपति ऐसे रहे जो उससे पहले उपराष्ट्रपति पद पर भी रहे. ये हैं: जे एडम्स, जेफरसन, फान बुरेन, फिलमोरे, ए जॉनसन, आर्थर, टी. रूजवेल्ट, कूलीज, ट्रुमैन, निक्सन, एल जॉनसन, फोर्ड और जॉर्ज बुश (सीनियर).
अमरीका में दो वर्ष ऐसे भी रहे जब सत्ता अनिर्वाचित राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के हाथ में रही. 1973 में उपराष्ट्रपति पद से स्पीरो टी एग्न्यू के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति निक्सन ने जेराल्ड फोर्ड को उपराष्ट्रपति नियुक्त किया. अगले साल निक्सन को भी इस्तीफा देना पड़ा और फोर्ड राष्ट्रपति बने. फिर फोर्ड ने नेल्सन रॉकफेलेर को उपराष्ट्रपति नियुक्त किया.
"फर्स्ट लेडी" यानी प्रथम महिला शब्द का पहली बार इस्तेमाल 1877 में लुसी वेयर वेब हायेस के लिए हुआ. वो राष्ट्रपति रदरफोर्ड बी हायेस की पत्नी थी जो 1877 से 1881 तक अमरीका के राष्ट्रपति रहे.
जेम्स बुकानन इकलौते ऐसे राष्ट्रपति रहे जिन्होंने कभी शादी नहीं की. वहीं रीगन इकलौते तलाकशुदा राष्ट्रपति थे. छह राष्ट्रपतियों की संतानें नहीं थी जब कि राष्ट्रपति टेलर के सबसे ज्यादा पंद्रह बच्चे थे.
चार अमरीकी राष्ट्रपतियों की पद पर रहते हुए हत्या की गई जिनमें लिंकन, गारफील्ड, मैककिनले और कैनेडी शामिल हैं.
अमरीका के नौवें राष्ट्रपति डब्ल्यू हैरीसन सिर्फ एक महीने ही पद पर रहे. चार मार्च 1841 को कार्यभार संभालने वाले हैरीसन का 4 अप्रैल 1841 को निधन हो गया.
अमरीका के 26 राष्ट्रपति पेशे से वकील रहे हैं जिनमें मौजूदा राष्ट्रपति बराक ओबामा भी शामिल हैं.

18.10.12

एक अफसर का खुलासाः ऐसे लूटा जाता है जनता का पैसा



महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एवं शरद पवार के भतीजे अजीत पवार ने अपने पद से इस्ती़फा दे दिया है. हालांकि उनके इस्ती़फे के बाद राज्य में सियासी भूचाल पैदा हो गया है. अजीत पवार पर आरोप है कि जल संसाधन मंत्री के रूप में उन्होंने लगभग 38 सिंचाई  परियोजनाओं को अवैध तरीक़े से म़ंजूरी दी और उसके बजट को मनमाने ढंग से बढ़ाया. इस बीच सीएजी ने महाराष्ट्र में सिंचाई घोटाले की जांच शुरू कर दी है. पवार ने वर्ष 2009 में जनवरी से लेकर अगस्त के दौरान 20 हज़ार करोड़ रुपये की परियोजनाओं को हड़बड़ी में क्यों म़ंजूरी दी, इसे लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं. राज्य में सिंचाई परियोजनाओं के निर्माण में भारी अनियमितताओं को लेकर कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने श्वेतपत्र जारी करने की घोषणा विधानसभा के अंदर और बाहर की थी, मगर राकांपा नेताओं के दबाव में अब तक सिंचाई परियोजनाओं में हुए भारी-भरकम खर्च की अपेक्षा सिंचाई के संसाधनों में मामूली सुधार न होने की हक़ीक़त दबकर रह गई. अब राज्यस्तरीय तकनीकी सलाहकार समिति एवं मेंढेगिरी जांच समिति के सदस्य मुख्य अभियंता विजय बलवंत पांढरे द्वारा प्रदेश के मुख्य सचिव को लिखे गए पत्र से चव्हाण सरकार की नींद उड़ गई है. उनका यह पत्र खुलासा करता है कि सिंचाई परियोजना के निर्माण में नौकरशाहों, ठेकेदारों एवं राजनेताओं का गठजोड़ किस तरह गोलमाल करके जनता का पैसा अपनी तिजोरी में भरता है. अभियंता पांढरे का यह पत्र किसी श्वेतपत्र से कम नहीं है. हालांकि चव्हाण सरकार किसी भी सूरत में इस पत्र को सार्वजनिक नहीं करना चाहती थी. आ़िखर इस पत्र में ऐसा क्या लिखा है कि महाराष्ट्र सरकार के होश उड़े हुए हैं. इस पत्र को चौथी दुनिया द्वारा सार्वजनिक किया जा रहा है, ताकि जनता को पता चले कि उसके पैसे से निर्मित होने वाली सिंचाई परियोजनाएं 15-20 साल तक क्यों अधूरी पड़ी रहती हैं, कैसे उनकी लागत में इज़ा़फा करके ठेकेदार, नेता और अ़फसर चांदी काट रहे हैं.
महाराष्ट्र में हज़ारों करोड़ रुपये का सिंचाई घोटाला हो गया और पूरा तंत्र आंख बंदकर देखता रहा. विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना ने भी इस मसले को नहीं उठाया. सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि दामनिया का दावा है कि उन्होंने इस घोटाले के बारे में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को जानकारी दी और उनसे इस मामले को उठाने के लिए कहा. अंजलि दामनिया किसी स्वार्थवश यह काम नहीं कर रही थीं. वह नितिन गडकरी से मुख्य विपक्षी पार्टी होने का धर्म निभाने की याचना कर रही थीं. नितिन गडकरी ने खुद इस मामले को उठाना तो दूर, अपनी ही पार्टी में भ्रष्टाचार सेल के प्रमुख किरीट सोमैया को भी मना कर दिया. अंजलि दामनिया के इस बयान को भारतीय जनता पार्टी और नितिन गडकरी नकार रहे हैं.
जब हमने सबसे पहले 26 लाख करोड़ के कोयला घोटाले का ख़ुलासा किया, तब भी नितिन गडकरी का यही चेहरा सामने आया था. महाराष्ट्र के एक बड़े पत्रकार के साथ चौथी दुनिया की टीम ने नितिन गडकरी से संपर्क साधा था. जब पहली बार उन्हें 26 लाख करोड़ रुपये के कोयला घोटाले के बारे में बताया गया था, तब वह गुवाहाटी में थे. टेलीफोन पर वह का़फी उत्सुक नज़र आए. उन्होंने यह भरोसा दिलाया था कि भारतीय जनता पार्टी इस मसले को ज़रूर उठाएगी. नितिन गडकरी ने फौरन अपने सहयोगी श्याम जाजू को चौथी दुनिया अ़खबार की प्रति देने के लिए कहा. उस व़क्त यह एहसास हुआ कि नितिन गडकरी आरएसएस द्वारा बनाए गए भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष हैं. वह संघ के अनुशासित एवं ईमानदार कार्यकर्ता हैं और उनमें देश के प्रति सेवा भावना मौजूद है.
तीन दिनों के बाद गडकरी साहब का जो चेहरा सामने आया, उससे यही साबित होता है कि इस समय राजनीतिक दल माफिया की तरह देश को लूटने-खसोटने में लगे हुए हैं. हम लगातार कोशिश करते रहे कि भारतीय जनता पार्टी कोयला घोटाले का मुद्दा उठाए, लेकिन उसने तब तक इस मुद्दे को नहीं उठाया, जब तक सीएजी की रिपोर्ट नहीं आ गई. भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि जिन कंपनियों को कोयला ब्लॉक आवंटित किए  गए थे, वे कांग्रेस और भाजपा को समान रूप से फंड देती हैं. अंजलि दामनिया के साहस का स्वागत होना चाहिए और उनकी बातों को गंभीरता से लेना चाहिए, क्योंकि उनकी बातों पर अविश्वास करने की कोई वजह नहीं है.
- संपादक

इन मामलों की स्वतंत्र जांच हो

  • सभी बजट पत्रों के रेट एनालिसिस की गड़बड़ी
  • सभी बजट पत्रों के लैंड स्टेटमेंट में हुई गड़बड़ी
  • सभी बजट पत्रों की उपयोगिता प्रस्ताव में हुई गड़बड़ी
  • सभी निविदाओं (टेंडर) में एक्सट्रा आइटम रेट लिस्ट में हुई अनियमितता
  • डीवाटरिंग आइटम की वृद्धि में हुई गड़बड़ी
  • सभी निविदाओं के क्लेम प्रकरण में हुई गड़बड़ी
  • सभी निविदाओं के क्लॉज 38 के प्रकरण में हुई गड़बड़ी
  • सभी बजट पत्रों में बढ़ी हुई क़ीमतें
  • सभी बजट पत्रों में पत्थरों की खुदाई में की गई वृद्धि
  • सभी उपसा सिंचन (लिफ्ट एरीगेशन) योजनाओं पर की गई फिज़ूलख़र्ची की जांच
  • सभी निर्मित और निर्माणाधीन उपसा सिंचन योजनाओं की समीक्षा
  • गेट फेब्रिकेशन के मूल्य निर्धारण में हुई गड़बड़ी
  • सीमेंट की एक्साइज ड्यूटी की जांच हो

विजय बलवंत पांढरे,
मुख्य अभियंता,
सदस्य राज्यस्तरीय तकनीकी सलाहकार समिति
सदस्य मेंढेगिरी जांच समिति
मेरी, नासिक,
दिनांक: 5/5/2012
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प्रति,
माननीय प्रधान सचिव
(जल संपदा नियोजन व विकास),
जल संपदा विभाग,
मंत्रालय, मुंबई-400032

  • महामहिम राज्यपाल, महाराष्ट्र राज्य, मुंबई
  • माननीय मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र
  • माननीय मुख्य सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग, महाराष्ट्र शासन

विषय: महामंडल की बजट मांगों की तकनीकी समिति द्वारा जांच कराने बाबत शिकायत.
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उपरोक्त विषय के संदर्भ में कुछ ठोस प्रमाण और उससे संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी से शासन को अवगत कराने का अनुरोध, पत्र द्वारा मुझसे किया गया था. इसी संदर्भ में विस्तृत जानकारी पेश कर रहा हूं. विभाग में जो कार्यभार ठेकेदार और राजनेताओं ने अधिकारियों की मदद से शुरू किया है, वह तत्काल बंद हो एवं जनता का पैसा अनावश्यक बेकार नहीं जाए, ऐसी अपेक्षा है. भविष्य में उपयोग किए जाने वाले अरबों रुपयों की फिज़ूलख़र्ची पर रोक लगे तो अच्छा होगा. सब कुछ सरकार के हाथ में है, यदि सरकार ही चूक करने लगेगी तो इस देश को कौन बचाएगा? स़िर्फ 6000 करोड़ से 7000 करोड़ रुपये की निधि हर साल उपलब्ध होने पर भी डीएसआर के हिसाब में 1 लाख करोड़ रुपये का ग़लत इस्तेमाल करना उचित नहीं है. मेरे द्वारा दिनांक 20 फरवरी, 2012 को दिए आवेदन में जो बात लिखी गई है, वह पूरी तरह सत्य है. सरकार ने इससे संबंधित अधिक जानकारी मांगी है. इसलिए इस संबंध में विस्तृत जानकारी पेश कर रहा हूं. सरकार द्वारा इन परियोजनाओं की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो सिंचाई परियोजना में हुई भारी अनियमितता की बात सामने आएगी.
सबसे पहले हम बात कर रहे हैं नरडवे परियोजना (कोंकण) की. इस परियोजना की ऊंचाई बढ़ाने के साथ ही बांध की लागत 200 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 650 करोड़ रुपये कर दी गई है. बांध की ऊंचाई बढ़ाने के लिए सरकार से किसी तरह की अनुमति प्राप्त नहीं है. लिहाज़ा इस परियोजना के अनुमानित बजट का परीक्षण किया जाना ज़रूरी है. नरडवे परियोजना का टेंडर तो तृतीय श्रेणी का है, फिर भी इसमें 30-40 करोड़ रुपये का ईआईआरएल मंज़ूर किया गया है. इस टेंडर में सा़फ लिखा गया है कि नो ईआईआरएल विल वी अलॉउड इन दिस टेंडर. बावजूद इसके ईआईआरएल का अधिकार न होते हुए भी कार्यकारी संचालक और मंत्री महोदय ने उसे अपनी म़ंजूरी प्रदान की है.
इन दिनों कोंकण इलाक़े में एक मुहिम खूब ज़ोरों से चल रही है. यहां लघु सिंचाई बांध का हवाला देकर परियोजनाओं की मंज़ूरी हासिल की जाती है. उसके बाद उसकी ऊंचाई बढ़ाने का प्रस्ताव महामंडल स्तर पर पारित कराया जाता है और उसके बाद करोड़ों रुपये का घोटाला किया जाता है. कोंकण इलाक़े में यह खेल पिछले बीस वर्षों से जारी है. यहां 30-40 लघु सिंचाई बांध के निर्माण कार्यों के प्रस्ताव कुछ समय बाद आने वाले हैं. हालांकि इस पर रोक लगनी चाहिए, क्योंकि कोंकण में उपलब्ध पानी का दस प्रतिशत भी उपयोग नहीं होता. ऐसे में यहां बड़ी संख्या में बांधों का निर्माण किस मक़सद से किया जाता है. वैसे भी सरकार के पास पैसा नहीं रहता? जो काम पहले से शुरू हैं, उन्हें पूरा करने के लिए भी पैसे नहीं हैं. पंद्रह-बीस वर्षों तक परियोजनाएं पूरी नहीं होतीं, फिर भी टेंडर निकाले जाते हैं. सरकार को चाहिए कि जिन निविदाओं (टेंडर) में 20 प्रतिशत से भी कम ख़र्च हुआ है, उन सभी निविदाओं की जांच हो, ज़रूरत पड़ने पर उन्हें रद्द कर देना चाहिए, ताकि जनता का भला हो सके. इन दिनों अत्यंत महंगी परियोजनाएं शुरू करने का दौर है. वास्तव में कम ख़र्च पर पानी को कैसे सुरक्षित एवं संग्रहित किया जा सकता है, इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए, लेकिन महामंडल बनने के बाद अत्यधिक महंगी लागत का बजट बनाकर फिज़ूल ख़र्च किया जा रहा है.
नासिक में मांजरपाड़ा (1) परियोजना की खुदाई के लिए निर्धारित दर से अधिक भुगतान किया गया. इस मामले की जांच होनी चाहिए. उसी तरह मांजरपाड़ा (2) परियोजना में भी अनाप-शनाप बजट को मंज़ूरी देने की प्रक्रिया शुरू है. इस परियोजना को देखते ही फिज़ूलख़र्ची की बात सामने आ जाती है. पानी उपलब्ध न होने पर भी इस परियोजना को पानी उपलब्धता का प्रमाणपत्र दिया गया है. पानी की कमी के बावजूद ऐसी परियोजनाओं को प्राथमिकता देने की कोशिश राजनेता कर रहे हैं. उसी तरह पैनगंगा खोरे में पानी न होने पर भी जल उपलब्धता का प्रमाणपत्र दिया गया है. पहले टेंडर जारी करके और फिर उसमें ख़ामियां दिखाकर उसकी लागत बढ़ाई जा रही है. मराठवाड़ा और विदर्भ में इस तरह के बैराज का़फी संख्या में हैं. यहां उपसा सिंचन परियोजना (लिफ्ट एरीगेशन प्रोजेक्ट) पूरी तरह नाकाम हो चुकी है. बावजूद इसके इस परियोजना पर 25-30 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च किए जा रहे हैं.
उपसा सिंचन (लिफ्ट एरीगेशन) का इतिहास बहुत बड़ा है. महाराष्ट्र में हज़ारों उपसा सिंचन योजनाएं बन चुकी हैं, लेकिन उनमें से 99 प्रतिशत फिलहाल ठप पड़ी हैं. वास्तव में ये सभी योजनाएं राजनेताओं एवं ठेकेदारों के फायदे के लिए बनाई गई हैं. उपसा सिंचन योजना नाकाम होने का एक अच्छा उदाहरण जलगांव ज़िले के मुक्ताई नगर में देखा जा सकता है. एकनाथ खड़से जब महाराष्ट्र के सिंचाई मंत्री थे, तब वर्ष 1999-2000 के बीच इस योजना का काम पूरा कर लिया गया था, लेकिन यह योजना एक वर्ष भी नहीं चली. इसकी वजह यह थी कि लोगों द्वारा पानी की मांग ही नहीं की गई, लिहाज़ा पिछले 12 वर्षों से यह योजना बंद पड़ी है. कोंकण की लघु सिंचाई बांध, मध्यम एवं बड़ी परियोजनाओं में भी का़फी गड़बड़ियां हैं. अगर इसकी निष्पक्ष जांच कराई जाए तो इसमें करोड़ों रुपये की हेराफेरी की बात सिद्ध हो जाएगी. ग़ौरतलब है कि विदर्भ में लाइनिंग के लिए करोड़ों रुपये के टेंडर हुए हैं, यदि इसकी जांच-पड़ताल की जाए तो यहां भी बड़े घोटाले का खुलासा हो सकता है. इन सभी महामंडलों (कॉरपोरेशन) के तहत स्टील फेब्रिकेशन का काम बड़े पैमाने पर किया गया है. इस स्टील फेब्रिकेशन के लिए बाज़ार भाव से कहीं अधिक रेट दिए गए हैं. अगर सभी महामंडलों के स्टील फेब्रिकेशन आइटम की जांच होती है तो यहां भी करोड़ों रुपये का घोटाला सामने आ सकता है. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि लगभग सभी महामंडलों (कॉरपोरेशन) ने इसका बजट बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है. उसी तरह जल संसाधन विभाग के तकनीकी विभाग के मा़र्फत जो कार्य किया जाता है, उसमें भी का़फी गड़बड़ी हुई है. इस तकनीकी विभाग की जांच एक अलग विषय है. इसलिए इसकी जांच स्वतंत्र रूप से कराई जानी चाहिए. महाराष्ट्र के जल संसाधन विभाग में भी आपसी समन्वय का अभाव है. विभागों पर सचिवों का कोई नियंत्रण नहीं रह गया है. कोंकण इलाक़े में पानी का महज़ 10 प्रतिशत उपयोग किया जाता है. इसके बावजूद बांधों की ऊंचाई बढ़ाने के लिए 40-50 बजट पत्र बनाने का काम जल संसाधन विभाग द्वारा किया जाता है. ऐसे सभी कार्यों को तत्काल स्थगित कर देना चाहिए, क्योंकि कोंकण से संबंधित बजट पत्र तकनीकी दृष्टि से अनुचित हैं.
तापी महामंडल में टेंडर नोटिस में दर्ज क़ीमत और वर्क ऑर्डर देने के दौरान तय क़ीमत की जांच हुई तो उसमें भारी वृद्धि नज़र आई. अगर तापी महामंडल के मूल बजट पत्र और संशोधित बजट पत्र के अंतर की जांच कराई जाए तो उसमें भी भारी अनियमितता का खुलासा होगा. इस तरह की सभी गड़बड़ियों की शुरुआत कृष्णा खोरे से हुई है. गठबंधन सरकार ने ही इस घपले की शुरुआत की है. वर्ष 1996 से 2001 के दौरान कृष्णा खोरे के बजट पत्र की गंभीरता से जांच हो तो उसमें भी भारी अनियमितता का पता चलेगा. जिन अधिकारियों ने कृष्णा खोरे में गड़बड़ी की, वही बाद में तापी गए, मराठवाड़ा गए. उसके बाद विदर्भ गए और अंत में कोंकण पहुंचे. इसमें कोई शक नहीं कि ठेकेदारों, राजनेताओं एवं कुछ अधिकारियों ने मिलीभगत करके महाराष्ट्र का आर्थिक सत्यानाश कर डाला. ऐसे में जब तक किसी पूर्व सचिव के मार्फत इन सभी बजट पत्रों की निष्पक्ष जांच नहीं होती है, तब तक यह गड़बड़ी सामने आने वाली नहीं है. जल संसाधन विभाग के महामंडल (कॉरपोरेशन) बनने के बाद ठेकेदारों द्वारा सीमेंट बेचना आसान हो गया है. अब सीमेंट पर इस विभाग का कोई नियंत्रण नहीं रह गया है. सीमेंट का कितना उपयोग किया जाना चाहिए, इसकी ज़रूरत ठेकेदार नहीं समझते. ऐसे में यहां बड़े पैमाने पर सीमेंट घोटाला हुआ है, इसकी भी जांच कराए जाने की आवश्यकता है. उल्लेखनीय है कि यहां पहले भी भारी मात्रा में अवैध तरीक़े से सीमेंट बेचे जाने का खुलासा हो चुका है. बड़ी मात्रा में सीमेंट बेचने के प्रकरण पर ही सचिव आर जी कुलकर्णी ने सीमेंट को परिशिष्ट-अ से बाहर कर दिया. गोसीखुर्द की बांयी नहर में भी अभियंताओं द्वारा भारी अनियमितता बरती गई, लेकिन उनके ख़िला़फ कोई कार्रवाई नहीं की गई. इससे यह साबित होता है कि काम चाहे कितना भी ख़राब क्यों न किया जाए, दोषियों को राजनेताओं का संरक्षण मिलता रहेगा. दस वर्ष पहले निम्न तापी परियोजना में घटिया निर्माण कार्य से संबंधित रिपोर्ट कार्यकारी अभियंता होने के नाते मैंने सरकार को भेजी थी. उसके बाद मेरा स्थानांतरण कर दिया गया, जबकि इस रिपोर्ट के आधार पर अन्य किसी का निलंबन नहीं किया गया. उसी तरह तारली परियोजना के निर्माण कार्य से संबंधित रिपोर्ट अधीक्षक अभियंता होने के नाते मैंने सरकार को सौंपी. हालांकि इस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. इस पत्र का सार यही है कि महाराष्ट्र के सभी महामंडलों (कॉरपोरेशन) में भयंकर गड़बड़ी हुई है.

इन बातों पर ग़ौर किया जाए

  • सभी महामंडलों (कॉरपोरेशन) को बर्ख़ास्त किया जाए
  • सचिव-1 पद भारतीय प्रशासनिक सेवा से भरा जाना चाहिए
  • कितनी क़ीमत की निविदा निकाली जाए, यह तय किया जाना चाहिए
  • 500 करोड़ से अधिक क़ीमत के बजट पत्र पर पाबंदी लगानी चाहिए
ग़ौरतलब है कि विदर्भ में वडनेरे समिति की जांच रिपोर्ट पर 1500 करोड़ रुपये की रिकवरी करने का आदेश सरकार ने दिया है. उसी तरह विदर्भ में 2900 करोड़ रुपये की लाइनिंग निविदा को रद्द करने का आदेश भी दिया गया है. इसकी जांच होने पर एक महामंडल में 4400 करोड़ रुपये का घपला होने का पता चला. इसलिए सभी महामंडलों में पिछले 15 वर्षों में किए गए सभी कार्यों की जांच की गई तो 20 हज़ार करोड़ रुपये फिज़ूल में ख़र्च करने का मामला सहज ही सिद्ध हो जाएगा. स़िर्फ उपसा सिंचन योजनाओं की निष्पक्ष एवं गहन जांच होने पर जनता के 15 हज़ार करोड़ रुपये पानी में जाने की बात सिद्ध हो जाएगी. ग़ौरतलब है कि ये सभी कार्य शुरू हैं. ऐसी घटनाएं भविष्य में न हों, इसलिए सरकार को ठोस क़दम उठाने की ज़रूरत है. यदि सही बजट पत्र बनाए जाते और उनका उचित तरीक़े से नियोजन किया जाता तो 40 हज़ार करोड़ रुपये इस तरह बर्बाद नहीं होते. आज राजनेताओं को अधिक संवेदनशील और अधिकारियों को भयरहित होकर काम करने की ज़रूरत है. कोंकण में सरकार द्वारा संशोधित मंजूरी प्राप्त न होने पर भी बड़े पैमाने पर ज़्यादा ख़र्च किया जा रहा है. ऐसे कार्यों की गंभीरता से जांच कर इन पर रोक लगाने की ज़रूरत है. कोंकण के सभी बांधों की ऊंचाई बढ़ाने के प्रकरणों की जांच पहले होनी चाहिए, ताकि उसमें हुए घोटालों का खुलासा हो सके. कोंकण के सभी ईआईआरएल (अतिरिक्त वस्तु मूल्य सूची) और क्लॉज 38 प्रकरणों की जांच होनी चाहिए, क्योंकि कोंकण इलाक़े में सिंचाई बहुत ही कम होती है, लेकिन सिंचाई के नाम पर हर साल भारी-भरकम खर्च होता हैं. इसे रोकने की ज़रूरत है. राज्य में घोटालों की संख्या न बढ़े, फिज़ूलख़र्ची पर रोक लगे, परियोजनाएं अधूरी न रहें और जनता का पैसा बेकार न जाए, इस बाबत एक नियंत्रक को बहाल किया जाए, क्योंकि इस मामले में अब कड़े फैसले लेने की ज़रूरत है.

सरकार जवाब दे यह देश किसका है



हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है. दुर्भाग्यवश 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद सरकार का सारा ध्यान कॉरपोरेट सेक्टर, विदेशी कंपनियों और विदेशी निवेश पर केंद्रित हो गया. कृषि क्षेत्र की लगातार उपेक्षा की गई और अगर ऐसा ही आने वाले 20 सालों तक चलता रहा तो जिस तरह देश की जनसंख्या बढ़ रही है, उसे देखते हुए देश में अनाज की भारी कमी हो जाएगी. हो सकता है कि जनसंख्या वृद्धि की दर कम हो, मगर वह बढ़ेगी ही और उसके लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं होगा. जब आप अपने लोगों का पेट नहीं भर सकते हैं, तब कोई भी विकास और कितना भी पैसा किसी देश की मदद नहीं कर सकता है.
जब जवाहर लाल नेहरू जीवित थे, तब कांग्रेस पार्टी ने तमिलनाडु में मद्रास के निकट अवाडी में एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय नीतियां समाजवाद के सिद्धांत को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए. 1991 में मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे और तब उन्होंने कहा कि इन नीतियों से देश के लोगों का भला नहीं हुआ और उन्होंने सारी नीतियों को उलट दिया. उनका मुख्य तर्क यह था कि लाइसेंस राज के दौरान कुछ लोगों ने सभी लाइसेंस अपनी मुट्ठी में कर लिए और बाद में उन्हें ऊंचे दामों पर दूसरों को बेच दिया, जो अनुचित था. यदि वह लाइसेंस राज खत्म कर देते तो शायद बहुत सारे लोग कल-कारखाने खोल सकते थे या कुछ और कर सकते थे, जिससे प्रतिस्पर्धा बढ़ती, कीमतों में कमी आती और लोगों को फायदा होता. पिछले 21 सालों में क्या हुआ है? महंगाई बढ़ गई है, कहीं भी प्रतिस्पर्धा नहीं है. इलेक्ट्रॉनिक एवं दूरसंचार जैसे जिन क्षेत्रों में काम हुआ है, तकनीकी विकास के कारण हुआ है, न कि सरकारी नीतियों की वजह से. यदि आईटी (सूचना प्रौद्योगिकी) कंपनियों ने बेहतर प्रदर्शन किया तो उसकी वजह तकनीक और समय में बदलाव था, अमेरिका और भारत में कीमतों का अंतर था. जहां कहीं भी सरकार शामिल थी, वहां कोई वास्तविक प्रगति नहीं हुई.
आपने अमेरिका को खुश करने के लिए न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल पास किया, खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति अमेरिका को खुश करने के लिए दी. इस देश के ग़रीबों का क्या हुआ? उदाहरण के तौर पर यहां लाभ पर कोई टैक्स नहीं है. यदि किसी कंपनी का मालिक लाभ की घोषणा करता है और उसे लाभ स्वरूप पैसे मिले हैं तो उसे उस पर कोई टैक्स नहीं देना होता है.
1991 के पहले और 1991 के बाद की परिस्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ. वहीं दूसरी तऱफ टू जी स्पेक्ट्रम और कोयले के मामले में अब सरकार का कहना है कि उसने स्पेक्ट्रम और कोयले की खदानों का आवंटन किया था. आवंटन लाइसेंस की जगह इस्तेमाल हुआ दूसरा शब्द है और उसने एक नए शब्द का इस्तेमाल किया. अगर दूसरे शब्दों में कहें तो उन्होंने टू जी स्पेक्ट्रम अपने पसंदीदा लोगों को आवंटित कर दिए और कोयले की खदानें भी अपने पसंदीदा लोगों को आवंटित कर दीं. आखिर उसने क्या किया? टू जी स्पेक्ट्रम के मामले में एक व्यक्ति ने x रुपये में स्पेक्ट्रम खरीदा और फिर एक महीने या फिर कुछ दिनों बाद दूसरे को उसे 10 x में बेच दिया. लोगों को सेवा प्रदान करने वाला व्यक्ति वह है, जिसने स्पेक्ट्रम 10 x कीमत पर खरीदा है. इस पर कपिल सिब्बल का तर्क था कि यदि सरकार स्पेक्ट्रम को ऊंचे दामों पर बेचती तो उससे दूरसंचार सेवा महंगी हो जाती. यह पूरी तरह झूठा बयान था, क्योंकि जो व्यक्ति लोगों को मोबाइल सेवा दे रहा है, उसने स्पेक्ट्रम 10 x कीमत पर खरीदा है. किसने x और 10 x के बीच पैसा बनाया? बिचौलिए ने. वह व्यक्ति, जिसे आपने स्पेक्ट्रम आवंटित किया था. किसे इस पैसे में से हिस्सा मिला, यह उनकी परेशानी का कारण है. हालांकि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने कहा है कि यदि वह इसे 10 x में बेचते तो उन्हें पैसे नहीं मिलते, क्योंकि यहां x और 10 x के बीच बड़ा अंतर है. कपिल सिब्बल और चिदंबरम हर दिन यही बयान देते थे कि सरकार को कोई घाटा नहीं हुआ है. इसका मतलब क्या है? एक अर्द्ध शिक्षित व्यक्ति भी यह समझ सकता है कि यदि आपने एक चीज को किसी दाम पर बेचा है और यदि उसे ज़्यादा दाम पर बेचा जा सकता था, तो यहां घाटा हुआ है. उच्चतम न्यायालय ने हाल में दिए अपने एक फैसले में कहा है कि नीलामी किसी भी चीज की सही कीमत पाने का एकमात्र तरीका नहीं है.
उच्चतम न्यायालय ने यह नहीं कहा कि आप कोयले की खदान और स्पेक्ट्रम अपने भतीजे को दे दें, अपने भांजे को दे दें या किसी ऐसे शख्स को दे दें, जिसका सरनेम (उपनाम) आपसे मिलता हो या फिर कोई ऐसा शख्स, जो आपका बहुत प्रिय हो. नहीं नहीं… बिल्कुल नहीं. उसने बस इतना कहा कि एक सही और पारदर्शी तरीका होना चाहिए, जिसमें नीलामी भी एक तरीका हो सकता है, दूसरे और तरीके भी हो सकते हैं. इसका यह मतलब नहीं है कि उच्चतम न्यायालय ने आपके किए को सही ठहराया है. अब सरकार ने सीएजी पर हमला करना शुरू कर दिया है, क्योंकि सीएजी ने यह निष्कर्ष निकाला है कि इन कोयला खदानों के आवंटन में हमें बहुत घाटा हुआ है. चिदंबरम ने यह कहा है कि सरकार को कोई घाटा नहीं हुआ है, क्योंकि कोयला अभी भी ज़मीन के अंदर ही है. यह सही है कि अभी घाटा नहीं हुआ है, लेकिन आपने निजी लोगों को फायदा पाने के अधिकार दे दिए हैं. जब भी कोयला बाहर निकाला जाएगा तो फायदा निजी कंपनियों को होगा, न कि सरकार को. यह अशोका होटल को 1000 करोड़ रुपये की बजाय 10 करोड़ रुपये में बेचने जैसा है और फिर आप कहते हैं कि सरकार को कोई घाटा नहीं हुआ है. आप कहते हैं कि होटल में रहने कोई नहीं आया. सरकार के लोग ही वहां नहीं ठहरेंगे तो दूसरे लोगों की बात छोड़िए. आपने संपत्ति को पहले ही बेच दिया है और जब कभी कोई होटल में ठहरता है तो वह पैसा कमाएगा, न कि सरकार.
यह समझना बहुत ज़रूरी है कि कब सीएजी घाटे की बात करता है. इसका मतलब है, जो फायदा हमें हो सकता था, उतना नहीं हो पाया. यह फायदे का नुकसान है. यह अनुमानित घाटा नहीं है, बल्कि यह वास्तविक घाटा है, क्योंकि हमने टू जी स्पेक्ट्रम के मामले में देखा कि एक कंपनी ने दूसरी कंपनी को अधिकार दस गुना दामों पर हफ्ते भर में बेच दिए. हमने कोयला खदान आवंटन के मामले में देखा कि जिन्होंने कोयले की खदानें ली हैं, उन्होंने बैंक से पैसे उधार ले लिए हैं और वे शेयर बाज़ार में अपने शेयर भी ला चुके हैं. वह भी इस आधार पर कि उन्होंने जगह खरीदी है. जबकि उन्होंने यह सब कुछ सरकार और बैंक के पैसे से लिया है. हर कोई खुश हो रहा है. यह समय कांग्रेस के अवाडी रिजॉल्यूशन पर लौटने का है, जिसमें कहा गया है कि हमें समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित समाज का निर्माण करना है, ग़रीबों का ख्याल रखा जाए. किसी ने यह नहीं कहा, अवाडी रिजॉल्यूशन में भी नहीं कहा कि कॉरपोरेट सेक्टर को बंद कर देना चाहिए या निजी क्षेत्र को कोई अधिकार नहीं होने चाहिए. सभी ने यह कहा है कि ग़रीबों का ख्याल रखा जाना चाहिए, पब्लिक सेक्टर को सुदृढ़ करना चाहिए. यहां निजी क्षेत्र के लिए बहुत से रास्ते खुले हैं, जहां वह अपना पराक्रम दिखा सकता है और अपना काम कर सकता है. सरकार द्वारा मनरेगा को लागू करना एक महत्वपूर्ण क़दम था. ग़रीबों के लिए 100 दिनों के रोजगार की व्यवस्था की गई थी. यह अलग बात है कि योजना को किस तरह क्रियान्वित किया गया और इसमें कितना भ्रष्टाचार फैला हुआ है, लेकिन यह क़दम सही था. मनरेगा में हर साल कितना पैसा खर्च किया जाता है, मान लीजिए 40 हज़ार करोड़, लेकिन यह पैसा कॉरपोरेट सेक्टर से आना चाहिए. धनवान लोगों को ग़रीबों के लिए भुगतान करना चाहिए. सरकार को कॉरपोरेट टैक्स 5 प्रतिशत बढ़ा देना चाहिए. अमीरों से पैसे लो और ग़रीबों में बांट दो, लेकिन यह सरकार ऐसा कभी नहीं कर सकती, क्योंकि उसे लगता है कि इससे शेयर बाज़ार में गिरावट आएगी. अमेरिका कहेगा कि तुम कॉरपोरेट सेक्टर को क्यों बर्बाद कर रहे हो.
अब क्या पहले देश के ग़रीबों एवं किसानों के हितों का ख्याल रखा जाएगा या फिर अमेरिकी अधिकारियों की खुशी का ख्याल रखा जाएगा? यह विषय आज हमारे सामने है. आपने अमेरिका को खुश करने के लिए न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल पास किया, खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति अमेरिका को खुश करने के लिए दी. इस देश के ग़रीबों का क्या हुआ? उदाहरण के तौर पर यहां लाभ पर कोई टैक्स नहीं है. यदि किसी कंपनी का मालिक लाभ की घोषणा करता है और उसे लाभ स्वरूप पैसे मिले हैं तो उसे उस पर कोई टैक्स नहीं देना होता है. कौन टैक्स देता है? कंपनी टैक्स देती है. एक बराबरी पर लाने के लिए कम से कम यह किया जाना चाहिए कि कंपनी में काम करने वालों को टैक्स के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए. कर्मचारियों का टैक्स जो कुछ भी हो, उसका भुगतान कंपनी को करना चाहिए. यदि कंपनी अपने मालिक के टैक्स का भुगतान कर सकती है तो वह कर्मचारियों के टैक्स का भुगतान भी कर सकती है. यदि ग़रीब कर्मचारी टैक्स का भुगतान कर रहे हैं, जिनकी एक नियत आमदनी है, महंगाई बढ़ रही है, उन्हें यह नहीं मालूम है कि इसका समाधान क्या होगा, मालिक को बिना किसी टैक्स का भुगतान किए लाभांश मिल रहा है, तो क्या हम एक सा़फ-सुथरे और न्यायपूर्ण समाज में रह रहे हैं? यह आधारभूत सवाल पूछने की ज़रूरत आ पड़ी है. अगले चुनाव इस विषय पर होंगे कि यह देश किसका है? क्या यह देश मुट्ठी भर व्यवसायिक घरानों का है या फिर करोड़ों किसानों एवं मज़दूरों का है, जो खेतों और फैक्ट्रियों में काम कर रहे हैं. यह आज के समय का सबसे बड़ा मुद्दा है. बात एक लाख अस्सी हज़ार करोड़ या एक लाख सत्तर हज़ार करोड़ की नहीं है, बात शासन की ईमानदारी की है, काम करने के सही तरीके की है, पारदर्शिता की है. सरकार ग़रीबों के वोटों से चुनी जाती है, लेकिन वह केवल धनी लोगों की सेवा करती है. इस तरह का लोकतंत्र कितने दिनों तक चलेगा. हमारा लोकतंत्र कुछ देशों की तरह हो गया है, जिनके नाम मैं नहीं लेना चाहता हूं, जहां मतदान तो होता है, लेकिन लोगों को आज़ादी नहीं है. भारत में भी हम लोग उस स्तर पर पहुंच गए हैं, जहां हमारी सारी आज़ादी समाप्त हो गई है.
हमें बताइए कि आम आदमी कोयला आवंटन में हुई लूट या फिर टू जी घोटाले या चारों तऱफ फैल रहे भ्रष्टाचार को देखकर क्या सोचता होगा? अन्ना हजारे जैसे लोगों का आंदोलन उनके कारण लोकप्रिय नहीं हुआ, बल्कि इन्हीं कारणों से हुआ है और अन्ना हजारे को अचानक गांधी बना दिया गया. उनका आंदोलन इतना बड़ा इसलिए हो गया, क्योंकि उन्होंने जनता की दुखती रगों पर हाथ रख दिया. लोग पहले से इन बातों का अनुभव कर रहे थे, उसी समय आंदोलन हुआ, इसलिए लोग उनके आसपास खड़े होने लगे, क्योंकि लोगों का मानना था कि अन्ना हजारे सही कह रहे हैं. जब तक सरकार यह नहीं दिखाएगी कि वह भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए कुछ कर रही है, भ्रष्टाचारियों को दंड दे रही है, गलत कामों को रोक रही है, तब तक लोगों को उस पर भरोसा नहीं होगा. लाभ कमाना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन लाभ का नाटक करके कुछ लोगों को लाभ देना सही नहीं है. कोयला आवंटन या फिर टू जी स्पेक्ट्रम में सरकार को लाभ नहीं हुआ, बल्कि कुछ लोगों को लाभ दिया गया, जो शर्मनाक है.
मैं वैश्विक समाजवाद को जानता हूं. 1991 में मनमोहन सिंह ने समाजवाद का मजाक उड़ाया, जैसे कि जवाहर लाल नेहरू या इंदिरा गांधी को देश के हितों का ख्याल ही नहीं था. हम लोग यह कभी नहीं भूल सकते हैं कि टाटा, बिड़ला एवं अंबानी जैसे उद्योगपति उसी समाजवादी काल की उपज हैं. 1991 के बाद क्या हुआ, यह सभी लोग जानते हैं. इस पूंजीवादी और प्रतिस्पर्धा वाली व्यवस्था में सरकार ने क्या पैदा किया है. मुझे लगता है कि कुछ भी नहीं. आप एक और बात समझ सकते हैं कि कॉरपोरेट सेक्टर को नीति बनाने के लिए किसी और लोगों की ज़रूरत नहीं है, वे स्वयं ही नीति बना लेते हैं. जो भी नियम-क़ानून हों, वे अपना रास्ता खुद बना लेंगे और अपनी जीविका चला लेंगे. इसलिए सरकार को उन लोगों की जीविका के लिए किसी तरह के क़ानून बनाने की ज़रूरत नहीं है. बनिया समाज या फिर कॉरपोरेट क्षेत्र अपने लिए रास्ते बना ही लेते हैं. कोई भी क़ानून पूरे देश के फायदे के लिए बनाया जाना चाहिए. इस तरह के क़ानून बनाए जाने चाहिए, जिनसे देश के अधिकांश लोगों को फायदा हो, न कि किसी वर्ग विशेष को. वे लोग धन कमा लेंगे, हालांकि वे जिस तरह से धन कमाना चाहते हैं या जितना धन कमाना चाहते हैं, उतना नहीं कमाएंगे, लेकिन उनका धन सफेद धन होगा. इतने से उन्हें संतुष्ट होना चाहिए, हमें संतुष्ट होना चाहिए. इसके बाद सरकार को भी अपनी ज़िम्मेदारी निभानी पड़ेगी. उसे जनता को जवाब देना होगा.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अवाडी अधिवेशन

वर्ष 1955 का अवाडी अधिवेशन कांग्रेस के लिए सबसे ऐतिहासिक माना जाता है. इसमें कांग्रेस ने राष्ट्र के समाजवादी स्वरूप की योजना बनाई थी. इसे जवाहर लाल नेहरू और मौलाना आज़ाद ने रचा था. अवाडी प्रस्ताव में कहा गया था कि कांग्रेस का लक्ष्य अब संविधान की उद्देशिका और राज्य के नीति निदेशक तत्वों का पालन करना होगा. योजनाएं समाजवादी स्वरूप के आधार पर बनाई जानी चाहिए, जिनमें उत्पादन के साधनों पर समाज का अधिकार हो, उत्पादन को बढ़ाया जाए और देश की संपत्ति के वितरण में समानता हो. देश के संसाधनों का उपयोग सभी लोगों के हित में किया जाएगा, न कि किसी वर्ग विशेष के फायदे के लिए इसका उपयोग किया जाएगा. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1955 में अवाडी प्रस्ताव पारित किया था. इसमें यह तय किया गया था कि भारत में किस तरह का समाज होगा और और इसके लिए क्या किया जाना है. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में हुए इस अधिवेशन में कांग्रेस ने समाज के समाजवादी स्वरूप के आदर्श को स्वीकार किया था. जवाहर लाल नेहरू का मानना था कि समाजवाद पूरे मानव समाज की समस्याओं का समाधान कर सकता है. केवल समाजवाद के माध्यम से ही ग़रीबी एवं बेरोजगारी को दूर किया जा सकेगा. समाजवाद ही देश के राजनीतिक और सामाजिक स्वरूप को बदल सकता है. यू एन ढेबर, पंडित जी बी पंत, मोरारजी देसाई, खंडूभाई देसाई, एस एन अग्रवाल, देवकी नंदन नारायण, बलवंतरी मेहता, डॉ. सैयद महमूद, हरे कृष्ण महताब, डॉ. के एन काटजू, गुलजारी लाल नंदा और लाल बहादुर शास्त्री आदि ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया था.

16.10.12

मौसम की तरह बदलती ज़िंदग़ी

 मंगलवार, 8 नवंबर, 2011 को 13:12 IST तक के समाचार

सिंगुर के युवा
सिंगुर याद है आपको? पश्चिम बंगाल के हुगली ज़िले में हाइवे के किनारे बसा यह कस्बा टाटा मोटर्स की लखटकिया कार संयंत्र के लिए सुर्खियों में आया था.
लेकिन अब सिंगुर के लोगों का जीवन पहाड़ियों में पल-पल बदलने वाले मौसम के मिज़ाज की तरह हो गया है.
टाटा मोटर्स की ओर से अधिग्रहीत ज़मीन पर उद्योग लगने या ज़मीन वापस पाने की आस लगाए बैठे किसान 'कभी ख़ुशी कभी ग़म' की तर्ज पर कभी सरकार और अदालती फ़ैसले से ख़ुश हो जाते हैं तो कभी ग़म में डूब जाते हैं.
ममता बनर्जी ने जब बीती मई में सत्ता संभालने के बाद अनिच्छुक किसानों की ज़मीन लौटाने के लिए एक नया क़ानून बनाया तो लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई थी.
लेकिन उसके बाद टाटा ने उस क़ानून को अदालत में चुनौती दी तो लोग असमंजस में पड़ गए. हाई कोर्ट ने जब सरकार के पक्ष में फ़ैसला दिया तो लोगों में उम्मीद की नई किरण पैदा हुई. लेकिन टाटा ने एक बार फिर उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है.

'ख़ुद कब्ज़ा'

सरकार का साथ

"अब जब सरकार हमारे साथ है तो कोई दिक्कत नहीं है. अब टाटा हमें अपनी ज़मीन वापस लेने से नहीं रोक सकता"
जीवन दास
सिंगुर में कृषि ज़मीन रक्षा समिति के एक नेता जीवन दास कहते हैं, ''हम जानते हैं कि क़ानूनी लड़ाई के चलते हमें अपनी ज़मीन वापस मिलने में दिक्कत हो सकती है. लेकिन अब जब सरकार हमारे साथ है तो कोई दिक्कत नहीं है. अब टाटा हमें अपनी ज़मीन वापस लेने से नहीं रोक सकता.''
वे कहते हैं कि ज़रूरी हुआ तो किसान अपनी ज़मीन पर ख़ुद क़ब्ज़ा कर लेंगे. कलकत्ता हाई कोर्ट ने हालांकि इस मामले पर फ़ैसला होने तक यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है. लेकिन स्थानीय किसान अपनी ज़मीन के लिए बेताब हैं.
जीवन कहते हैं, ''हमने अपनी ज़मीन के लिए बरसों इंतज़ार किया है. कई किसान इसी ग़म में आत्महत्या कर चुके हैं. कुछ लोग ग़रीबी और अवसाद के चलते मर गए. लेकिन अब हम अनिश्चित समय तक इसका इंतज़ार नहीं कर सकते.''
सिंगुर संयंत्र के आस-पास खामोशी छाई है. हाइवे से गुज़रने वाले ट्रकों और दूसरे वाहनों से ही यह खामोशी टूटती है.
तरुण दास के पिता ने भी इस परियोजना के लिए अपनी ज़मीन दी थी. बदले में तरुण को इस संयंत्र में नौकरी मिली थी. उसने प्रशिक्षण भी लिया था. लेकिन अब वह बेरोज़गार हैं.
सिंगुर के 53 वर्षीय किसान देवेन मंडल ने इस परियोजना के लिए अपनी पाँच बीघा ज़मीन दी थी. उनको सीधे नौकरी का भरोसा मिला था. लेकिन नौकरी नहीं मिली. देवेन अब लंबे समय से बीमार चल रहे हैं.

औद्योगीकरण

जीवन दास
जीवन दास बताते हैं कि कई किसान ज़मीन जाने के ग़म में आत्महत्या कर चुके हैं
दरअसल, सूचना तकनीक के मामले में किसी ज़माने में जो लहर बंगलौर में चली थी, औद्योगीकरण के मामले में वही लहर वाममोर्चा के शासन वाले पश्चिम बंगाल में चली.
मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने वर्ष 2006 में दोबारा सत्ता में लौटने के बाद राज्य में औद्योगीकरण की प्रक्रिया तेज़ कर दी थी.
विभिन्न उद्योगों के साथ राज्य में विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईज़ेड) यानी सेज़ की स्थापना का काम भी तेज़ी से शुरू हुआ. पहले यहां एक ही सेज़ था, बाद में कई और नए प्रस्तावों को हरी झंडी दिखा दी गई.
लेकिन इनके लिए खेती की ज़मीन के अधिग्रहण से लोगों में भारी नारज़गी उभरी.
विपक्षी राजनीतिक दलों ने तो आंदोलन छेड़ा ही, खुद वाममोर्चा के घटक दल भी सेज़ के लिए खेती की ज़मीन के अधिग्रहण का सार्वजनिक तौर पर विरोध करने लगे.
ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर आंदोलन करने वाली ममता बनर्जी का कहना था कि तृणमूल कांग्रेस औद्योगीकरण के ख़िलाफ़ नहीं हैं. लेकिन इसके लिए खेती की ज़मीन का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए.
दूसरी ओर, तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की दलील थी कि नैनो परियोजना से सिर्फ़ सिंगुर या हुगली ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य का चेहरा बदल जाता.

सहायता की अपील

हालांकि सिंगुर व नंदीग्राम की घटनाओं के बाद वाममोर्चा के घटक दलों व विपक्ष के दबाव में ही राज्य सरकार को कहना पड़ा कि वह आगे से ऐसी परियोजनाओं के लिए खेती के ज़मीन के अधिग्रहण से बचने का प्रयास करेगी.
"अधिग्रहण के मामले में सरकार को मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाहिए ताकि दोनों-उद्योगों और किसानों-को फायदा हो. अधिग्रहण में दिक्कतों के चलते ही परियोजना का काम आगे नहीं बढ़ रहा है"
अनिरुद्ध धूत
वाममोर्चा की ग़लतियों से सबक लेते हुए ही ममता बनर्जी सरकार ने उद्योगों के लिए ज़मीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया से ख़ुद को अलग कर लिया है.
अपनी नई ज़मीन नीति के प्रारूप में सरकार ने साफ कर दिया है कि उद्योग लगाने के लिए निजी कंपनियों को ज़मीन का अधिग्रहण खुद करना होगा.
पहले सिंगुर समेत तमाम मामलों में पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास निगम नामक सरकारी एजेंसी ज़मीन का अधिग्रहण कर उसे संबंधित कंपनी को सौंपती थी.
लेकिन सरकार की इस नीति पर उद्योग संगठनों ने चिंता जताई है. एसोसिएटेड चैंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री (एसोचैम) की पूर्वी शाखा के अध्यक्ष सुनील कानोरिया कहते हैं, ''सरकार को इस मामले में संतुलित भूमिका निभानी होगी. वह हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी रह सकती.''
ज़मीन अधिग्रहण में होने वाली दिक्कतों के चलते ही वीडियोकॉन समूह ने बंगाल से अपनी इस्पात और बिजली परियोजना को कहीं और ले जाने की इच्छा जताई है.
उसने अक्तूबर, 2007 में ही राज्य सरकार के साथ इसके लिए सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन इसके लिए ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है.
कंपनी ने राज्य सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप और सहायता की अपील की है. एक कार्यक्रम के सिलसिले में कोलकाता आए वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज के निदेशक अनिरुद्ध धूत कहते हैं, ''अधिग्रहण के मामले में सरकार को मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाहिए ताकि दोनों-उद्योगों और किसानों-को फायदा हो. अधिग्रहण में दिक्कतों के चलते ही परियोजना का काम आगे नहीं बढ़ रहा है.''
यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि कर्ज़ के भारी बोझ और माओवादी समस्या से जूझ रही ममता बनर्जी सरकार अब उद्योगपतियों को राज्य में निवेश के लिए आकर्षित करने का प्रयास ज़रूर कर रही है लेकिन ज़मीन अधिग्रहण के मामले में सरकार के हाथ खड़े कर लेने की वजह से निवेशक भारी असमंजस में हैं. ऐसे में सिंगुर की खाली पड़ी ज़मीन और वहां के लोगों का भविष्य क्या होगा, इस बात का अनुमान लगाना फ़िलहाल मुश्किल है.