19.7.12

बृहस्पतिवार, 5 जुलाई 2012

ये सृष्टि ईश्वर की नहीं, गॉड पार्टिकिल की रचना है


4 जुलाई 2012 का दिन हमेशा याद रखा जाएगा, क्योंकि इस दिन हमने अपने ज्ञान की अचंभित कर देने वाली ऊंचाई देखी, क्योंकि इस दिन पहली बार हमने पूरे तार्किक प्रमाणों के साथ जान लिया कि ये ब्रह्मांड-ये सृष्टि किसी ईश्वर की रचना नहीं, बल्कि फिजिक्स के नियमों के तहत काम करने वाले ऊर्जा कणों हिग्स-बोसॉन की रचना है। इस सृष्टि की शुरुआत कैसे हुई? ये सवाल हमारे अस्तित्व जितना ही पुराना है। खुद को, इस जमीन और आसमान को और इस पूरी दुनिया और उससे परे ब्रह्मांड को समझने की हमारी चाह कितनी गहरी रही है इसका पता इस बात से चलता है कि विश्व की हर संस्कृति में सृष्टि की शुरुआत से जुड़े अलग-अलग और कमाल के मिथक मौजूद हैं। विज्ञान कभी अहंकार से भरे दावे नहीं करता, बल्कि विनम्रता के साथ उन नए तथ्यों को सामने लाता है, जो लगातार प्रयोगों के बाद सामने आते हैं। ये ब्रह्मांड किसने बनाया? इस सृष्टि की शुरुआत कैसे हुई? वो असली रचनाकार कौन है? विज्ञान इन सवालों के जवाब 40 साल से ढूंढ़ रहा है। इसी क्रम में सत्येंद्रनाथ बोस और आइंस्टीन ने बोसॉन की अवधारणा सामने रखी। फिर पीटर हिग्स ने बोसॉन की प्रकृति से मिलते-जुलते ऊर्जा से दमकते एक अनोखे कण की बात कही, ये सैद्धांतिक कण इतना अनोखा था कि ये एक परमाणु से लेकर सूरज तक के वजन के लिए जिम्मेदार था। इसे हिग्स-बोसॉन कहा गया। हिग्स-बोसॉन की प्रकृति सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है, इसलिए एक पत्रकार ने इसका नाम गॉड पार्टिकिल रख दिया, बस फिर क्या था, दुनिया रोमांच से भर उठी और प्रयोगशालाएं गॉड पार्टिकिल की तलाश में जुट गईं। गॉड पार्टिकिल की तलाश में सबसे ज्यादा तेजी पिछले चार साल के दौरान देखी गई जब फिजिक्स की प्रमुख प्रयोगशालाओं फर्मी लैब, टेवेट्रॉन और सर्न में गॉड पार्टिकिल के निशान मिलने से एक नई सनसनी मचने लगी। गॉड पार्टिकिल की खोज का रास्ता दिखाने का श्रेय जाता है अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी की पार्टिकिल फिजिसिस्ट डॉ. मीनाक्षी नारायण को। डॉ. मीनाक्षी नारायण ने फर्मी लैब में 1995 में सिंगल टॉप क्वार्क की खोज करके साबित कर दिया था कि गॉड पार्टिकिल कोई काल्पनिक कण नहीं है और इसे खोजा जा सकता है। और फिर वो दिन भी आ गया जब, 4 जुलाई को सर्न में हुई एक खास प्रेस कांफ्रेंस में खुद पीटर हिग्स ने एक नए तरह के गॉड पार्टिकिल मिलने की घोषणा कर दुनिया को अचंभे में डाल दिया। अपने पाठकों के लिए वॉयेजर पेश करता है गॉड पार्टिकिल की खोज की कहानी खुद डॉ. मीनाक्षी नारायण की जबानी।


मुझे बेहद खुशी है कि मैं विज्ञान के इस ऐतिहासिक पल की साक्षी बनी। मुझे भारतीय होने का गर्व है कि मैं एक पार्टिकिल फिजिसिस्ट हूं और विज्ञान के भविष्य की दिशा तय करने में मैं भी एक छोटा सा योगदान दे सकी। 4 जुलाई, यानि अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस, लेकिन ये तारीख विज्ञान की दुनिया में एक अलग वजह के लिए याद रखी जाएगी। अज्ञानता के अंधेरे को पीछे छोड़कर ज्ञान की एक नई रोशनी की ओर कदम बढ़ाने के लिए। असतो मां ज्योतिर्गमय।
यूं तो गॉड पार्टिकिल की तलाश 40 साल पुरानी है और अगर सर्न की ही बात करें तो बीते 10 साल से वैज्ञानिक हिग्स-बोसॉन को तलाशने में जुटे थे। लेकिन पिछले तीन साल के दौरान जेनेवा की सर्न लैब में गॉड पार्टिकिल की खोज को लेकर गहमा-गहमी काफी बढ़ गई थी। दुनिया के अलग-अलग देशों से आई वैज्ञानिक टीम्स सर्न में मौजूद प्रोटॉन तोड़ने की मशीन लॉर्ज हैड्रॉन कोलाइडर के सीएमएस और एटलस डिटेक्टर्स में गॉड पार्टिकिल यानि हिग्स-बोसॉन को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। ये एक लुका-छिपी के खेल जैसा था, कभी तो लगता कि बस हमने बाजी मार ली और कभी प्रयोग के अपने तौर-तरीकों पर ही संदेह होने लगता था।  
और आज वो दिन भी आ गया जब दुनिया के कोने-कोने से आए फिजिसिस्ट के साथ हम सर्न के ऑडिटोरियम में इन प्रयोगों के नतीजों के जाहिर होने का इंतजार कर रहे थे। हिग्स-बोसॉन की खोज परमाणु को समझने के हमारे स्टैंडर्ड मॉडल की वो खोई कड़ी है जिसके बगैर हम ब्रह्मांड की रचना के रहस्य को समझ नहीं सकते।
सर्न में जब खबर मिली कि 1960 में हिग्स-बोसॉन के सिद्धांत को विकसित करने वाले पीटर हिग्स को 4 जुलाई की घोषणा करने के लिए निमंत्रित किया गया है तो यहां मौजूद सभी वैज्ञानिकों के दिलों की धड़कनें तेज हो गईं। हालात ये थि के 3 जुलाई की रात से ही हॉल के बाहर लाइनें लगने लगीं और कई लोगों ने तो रात बकायदा दरवाजा खुलने के इंतजार में बिताई। पीटर हिग्स की मौजूदगी ने लोगों को संकेत दे दिया कि कुछ ऐतिहासिक घटने वाला है। और 4 जुलाई को जेनेवा में ठीक 9 बजे लोग जिस खबर का इंतजार कर रहे थे इसे जो इन्कैडेला ने सार्वजनिक कर दी, “We have observed a new boson… हमने एक बिल्कुल नए तरह का बोसॉन खोज निकाला है।”
सर्न के डायरेक्टर जनरल रॉल्फ ह्युर ने कहा, “I think we have it, We have discovered a particle that is consistent with a Higgs boson... मुझे लगता है कि हमने ढूंढ निकाला। हमने एक ऐसा पार्टिकल खोज निकाला है जो हिग्स-बोसॉन जैसा है।”
पार्टिकिल फिजिक्स में कोई नई खोज कितनी महत्वपूर्ण है, इसका निर्धारण एक खास पैमाने से किया जाता है, जिसे सिगमा कहते हैं। वन सिगमा का अर्थ है कि नतीजे डेटा में अचानक किसी उतार-चढ़ाव की वजह से हैं। थ्री सिगमा तक के नतीजों को ऑब्जर्वेशन का दर्जा दिया जाता है और 5 सिगमा के नतीजों को एक नई खोज का सम्मान प्राप्त होता है। 4 जुलाई को जिन नतीजों की घोषणा की गई है वो शुरुआती हैं, क्योंकि 2012 के प्रयोगों के डेटा का परीक्षण अब भी जारी है। एलएचसी के डिटेक्टर्स एटलस और सीएमएस के प्रयोगों से मिले डेटा की समीक्षा जुलाई के अंत तक पूरी होने की उम्मीद है। जहां तक 4 जुलाई की उदघोषणा का सवाल है तो इसमें हिग्स-बोसॉन जैसे कण के मिलने की बात कही जा रही है, उसके सिगनल 4.3 सिगमा से ऊपर नहीं गए हैं। इसका मतलब ये है कि इस प्रायोगिक नतीजे में हिग्स-बोसॉन यानि गॉड पार्टिकिल के वास्तव में मिलने की संभावना 99.996 प्रतिशत है, शेष 0.0004 प्रतिशत संभावना इस बात की भी हो सकती है कि ये सिगनल महज नॉइस हों। जबकि दूसरी ओर 5 सिगमा सिगनल को पार्टिकिल फिजिक्स में ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ की उपमा दी जाती है। किसी नई खोज की घोषणा तभी की जाती है जब सिगनल 5 सिगमा के जादुई स्तर को स्पर्श कर लेता है।
पिछले दो साल से हिग्स कणों के पकड़ने के लगातार संकेत मिल रहे थे। इसके बाद ये संकेत संभावित साक्ष्य में तब्दील हो गए और अब हमने एक प्रामाणिक खोज करने में सफलता हासिल कर ली है। अगर एलएचसी ने हिग्स पार्टिकिल के संकेत नहीं पकड़े होते तो गॉड पार्टिकिल को खोज निकालने में ये नाकामी, देसी भाषा में कहूं तो मॉडर्न फिजिक्स को उल्टा टांग देती। लेकिन फिजिसिस्ट कभी चैन से नहीं बैठते वो काफी खोजी होते हैं, इसलिए गॉड पार्टिकिल को खोजने में हाथ आई ये नाकामी भी उन्हें एक नए उत्साह से भर देती और वो किसी नए समीकरण की तलाश में ब्लैकबोर्ड पर व्यस्त हो जाते। लेकिन हिग्स को लेकर संदेह जताने वाले सभी लोगों के लिए सबूत सामने हैं, इस बात के प्रबल साक्ष्य हैं कि हिग्स-बोसॉन या गॉड पार्टिकिल कोई काल्पनिक सिद्धांत नहीं बल्कि एक ठोस हकीकत हैं और स्टैंडर्ड मॉडल बिल्कुल उतना ही सटीक है, जितना कि किसी फिजिसिस्ट को उस पर यकीन है।


- डॉ. मीनाक्षी नारायण
प्रोफेसर, ब्राउन यूनिवर्सिटी
(लेखिका गॉड पार्टिकिल की खोज करने वाले वैज्ञानिकों की कोर टीम की सदस्य हैं)
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वॉयेजर स्पेशल -  जल्द आ रहा है

14 जुलाई 1930, जर्मनी की राजधानी बर्लिन के बाहरी इलाके में मौजूद एक घर में पूरब से आने वाले एक खास मेहमान के स्वागत की तैयारियां चल रहीं थीं। ये घर था महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन का और वो खास मेहमान थे गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर। इस ऐतिहासिक मुलाकात के दौरान गुरुदेव ने आइंस्टीन का विशेष साक्षात्कार लिया। इस साक्षात्कार में दोनों महान विभूतियों ने दर्शन, धर्म और मानव समाज पर असर डालने वाले कई विषयों पर विचारों का आदान-प्रदान किया। वॉयेजर अपने पाठको के लिए ला रहा है ये पूरा साक्षात्कार, हिंदी में पहली बार 

इस तरह शुरु हुई गॉड पार्टिकिल की खोज

शिकागो के बटाविया की फर्मी लैब में लगी मेरी तस्वीर और उसके नीचे लिखा वाक्य – टॉप क्वार्क की अविष्कारक – मुझे लगातार कुछ और बेहतर करने को प्रेरित करता रहता है। मैं 1995 का वो पल नहीं भूल सकती जब फर्मी लैब की पार्टिकिल कोलाइडर मशीन में 20 अरब कणों की टक्कर से जब सिंगल टॉप क्वार्क्स कण पैदा हुए थे। ये अविश्वसनीय था, असाधारण, मानो कोई सपना सच हो गया हो। दुनियाभर के भौतिकशास्त्रियों ने परमाणु के नाभिक में मौजूद प्रोटान के भीतर टॉप क्वार्क की खोज पर कहा था कि इस खोज के बाद अब कुछ भी नामुमकिन नहीं रहा। अब आधुनिक भौतिक विज्ञान की धारा ही बदल जाएगी। 
सिंगल टॉप क्वार्क, हिग्स बोसॉन के जैसा ही एक सैद्धांतिक कण है। दरअसल 14 अरब साल पहले जब ऊर्जा के महाविस्फोट के बाद पदार्थ के शुरुआती कणों ने जन्म लिया तो उन कणों का गुण-धर्म तय करने वाले कई दूसरे अनजाने कण भी अस्तित्व में आ गए, मिसाल के तौर पर सिंगल टॉप क्वार्क और हिग्स बोसॉन। आधुनिक भौतिकी के सिद्धांत बताते हैं कि हिग्स-बोसॉन की मौजूदगी ने ही पदार्थ के कणों में वजन पैदा किया। लेकिन हिग्स बोसॉन इस कदर रहस्यमय हैं कि वैज्ञानिकों ने उन्हें गॉड पार्टिकिल यानि ईश्वरीय कणों का नाम दे रखा है। सिंगल टॉप क्वार्क कण की खोज के बाद पूरे भौतिक विज्ञान जगत का यकीन पुख्ता हो गया है कि वो गॉड-पार्टिकिल को भी खोज निकालने में कामयाब रहेंगे।
दरअसल, वैज्ञानिक एक सवाल पर हमेशा से बहस करते रहे हैं कि ब्रह्मांड की संरचनाओं, यहां तक कि इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन जैसे मूल अणुओं में मास यानि द्रव्यमान कहां से आता है। द्रव्यमान को बोलचाल की भाषा में हम वजन समझ लेते हैं लेकिन ये वजन से बिल्कुल अलग है। असल में जब द्रव्यमान पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति काम करती तो वजन पैदा होता है। मिसाल के लिए अगर हम चंद्रमा पर जाएं तो हमारे शरीर का द्रव्यमान वही रहेगा लेकिन उसका वजन कम हो जाएगा। वजह ये कि चांद पर गुरुत्वाकर्षण में कमी आने से हमारा वजन घट जाता है। भौतिक विज्ञान के मुताबिक पदार्थ में वजन का समावेश होता है हिग्स-बोसॉन यानि गॉड पार्टिकिल की वजह से, जो अब तक भौतिक वैज्ञानिकों की आंखों से बचता रहा है।
हिग्स बोसोन कण की खोज 1964 में ब्रिटिश भौतिकविद् पीटर हिग्स और भारतीय भौतिक विज्ञानी सत्येंद्रनाथ बोस ने की थी। 1924 में बोस ने एक सांख्यिकीय गणना का जिक्र करते हुए एक पत्र आइंस्टीन के पास भेजा था, जिसके आधार पर बोस-आइंस्टीन के गैस को द्रवीकृत करने के सिद्धांत का जन्म हुआ। इस सिद्धांत के आधार पर ही प्राथमिक कणों को दो भागों में बांटा जा सका और इनमें से एक का नाम बोसोन रखा गया जबकि दूसरे का नाम इटली के भौतिक वैज्ञानिक इनरिको फर्मी के नाम पर रखा गया। दशकों बाद 1964 में ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्स ने बिग बैंग के बाद एक सेकेंड के अरबवें हिस्से में ब्रह्मांड के द्रव्यों को मिलने वाले भार का सिद्धांत दिया, जो बोस के बोसोन सिद्धांत पर ही आधारित था। इसे बाद में 'हिग्स-बोसोन' के नाम से जाना गया। ये सिद्धांत न केवल ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्यों को जानने में मददगार साबित हुआ बल्कि इसके स्वरूप को परिभाषित करने में भी मदद की।
गॉड पार्टिकिल के रहस्य का एक संक्षिप्त इतिहास है। 30 साल पहले वैज्ञानिकों ने समीकरणों की एक श्रृंखला बनायी थी, जिसे स्टैंडर्ड मॉडल कहा गया। इसके अनुसार मूलभूत कणों और बलों के संबंध से ब्रह्मांड की संरचना समझायी गयी थी। लेकिन मॉडल मे कुछ कमियां हैं। भौतिकी की यह फितरत रही है कि एक गुत्थी सुलझते ही दूसरी आ खड़ी होती है। जिसे सुलझाने के लिए फिर नए सिरे से खोज शुरू की जाती है। ऐसी ही एक गुत्थी है, पदार्थ में मौजूद भार के मामले में। समस्या ये थी कि कुछ कणों का भार होता है और कुछ का नहीं। मुख्य थ्योरी ये थी कि कण का भार इस बात पर निर्भर करता है कि वो रहस्यमयी हिग्स फील्ड के साथ किस प्रकार अंतरक्रिया करता है, क्योंकि ये फील्ड सारे अंतरिक्ष में फैला हुआ है। सिंगल टॉप क्वार्क कणों की खोज ने कई गुत्थियां हल कर दीं, और गॉड पार्टिकिल की खोज के नए दरवाजे खोल दिए।
-    डॉ. मीनाक्षी नारायण,प्रोफेसर, ब्राउन यूनिवर्सिटी
(लेखिका गॉड पार्टिकिल की खोज करने वाली वैज्ञानिकों की कोर टीम की महत्वपूर्ण सदस्य हैं)

शनिवार, 23 जून 2012

... कैन यू हियर मी ?


अमेरिका की कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी का दर्शकों से खचाखच भरा बेकमैन ऑडिटोरियम कई मशहूर वैज्ञानिक, पीएचडी स्टूडेंट्स और रिसर्च स्कॉलर्स सीट के लिए मशक्कत कर रहे हैं। जितने लोग सीट्स पर बैठे हैं, उनसे ज्यादा किनारों पर खड़े नजर आ रहे हैं। जो लोग सीट्स नहीं पा सके उनमें मशहूर फिजिसिस्ट बिल नाई और यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया लॉस एंजिल्स के प्रोफेसर एलन युइले भी हैं। ये गहमा-गहमी और इंतजार काफी खास है, क्योंकि ऑडिटोरियम की स्पॉटलाइट महान एस्ट्रोफिजिसिस्ट प्रो. डॉ. स्टीफन हॉकिंग पर है और आज वो साइंस के साथ अपनी शुरुआती जिंदगी और अपने जुनून से जुड़ी कई बातों को भी साझा करेंगे। 
अचानक हलचल बढ़ गई और सबकी निगाहों के साथ स्पॉट लाइट ऑडिटोरियम के दाईं ओर घूम गई, अपनी व्हीलचेयर को ऑपरेट करते हुए प्रो. हॉकिंग वहां से मंच पर प्रवेश कर रहे हैं...और इसी के साथ ऑडिटोरियम में खामोशी छा गई। टॉक की शुरुआत प्रो. हॉकिंग ने अपने चिर-परिचित मजाकिया अंदाज में की। ऑडिटोरियम के स्पीकर्स पर प्रो. हॉकिंग की सेंथेसाइजर आवाज गूंजी.....

... कैन यू हियर मी?....

" जिंदगी का असली मजा खोज में है, एक नई और ऐसी खोज जिसके बारे में लोग पहले से कुछ भी न जानते हों। इस खोज, इस तलाश की तुलना मैं सेक्स से नहीं कर सकता, लेकिन इसकी खुमारी, इसका आनंद कहीं ज्यादा देर तक बरकरार रहता है।"

(इसी के साथ ऑडिटोरियम में ठहाके गूंज उठते हैं)

"बीते 49 साल से मै हर दिन मौत की आशंका के बीच जी रहा हूं। मुझे मरने से डर नहीं लगता लेकिन मुझे मरने की ऐसी कोई खास जल्दी भी नहीं है। ऐसे कई काम हैं जो मैं पहले करना चाहता हूं। जब वक्त से पहले आपका सामना मृत्यु की संभावना से होता है, उस क्षण आपको इसका अहसास होता है कि जिंदगी वाकई जीने के लायक है, और ऐसी तमाम सारी चीजें हैं जो आप करना चाहते हैं।
मेरे हिसाब से दिमाग एक कंप्यूटर की तरह है, जो तब काम करना बंद कर देता है जब इसके दूसरे हिस्से खराब हो जाते हैं। टूटे और एकदम खराब हो चुके कंप्यूटर के लिए कोई दूसरी जिंदगी और स्वर्ग जैसी चीजें नहीं होतीं। स्वर्ग-नर्क और मौत के बाद दूसरी जिंदगी की बातें ऐसे लोगों की कल्पनाएं भर हैं, जिन्हें अंधेरों से डर लगता है। दर्शऩशास्त्र और आध्यात्म का अध्ययन समय की बरबादी से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि क्योंकि इनकी ज्यादातर बातें प्रायोगिक साक्ष्यों और आधुनिक विज्ञान के खिलाफ हैं।
बचपन में मेरा क्लासवर्क अशुद्धियों से भरा बेतरतीब होता था और मेरी हैंडराइटिंग तो मेरे शिक्षकों को निराशा से भर देती थी। लेकिन लड़कपन के मेरे दोस्तों ने मेरा नाम आइंस्टीन रख दिया था, मुझे तो पता नहीं, लेकिन शायद उन्हें मुझमें ऐसे कोई बेहतर लक्षण नजर आते होंगे। जब मैं 12 साल का था तब मेरे एक दोस्त ने दूसरे दोस्त के साथ ये कहते हुए चॉकलेट के एक पैकेट की बाजी लगाई थी कि देखना ये नालायक का नालायक ही रहेगा।
जब मैं ऑक्सफोर्ड आया तो दाखिले से पहले मुझे एक एक्जाम और देना पड़ा, इस परीक्षा का नतीजा ये रहा कि अगले तीन साल मुझे ऑक्सफोर्ड में बिताने पड़े, जिसका अंत एक और एक्जाम के साथ हुआ। मैंने एक बार गणित लगाया तो पता चला कि ऑक्सफोर्ड में तीन साल के दौरान मैंने एक हजार घंटे का काम किया। लेकिन औसतन ये बस रोजाना एक घंटे ही था, इसलिए मैं किसी शाबासी का दावा नहीं कर सकता था। 
हमेशा एक छात्र बने रहना और कभी हिम्मत न हारना हमें आगे की ओर ले जाता है। याद रखिए, सितारों से भरे आसमान को देखिए और कभी घुटने मत टेकिए। आप जो देखते हैं महसूस करते हैं उसमें छिपे तार्किक अर्थ खोजिए। जिंदगी के हालात मुश्किल भी हो सकते हैं, लेकिन सबसे निराशाजनक परिस्थितियों में भी आपके लिए बहुत कुछ नया और अलग करने की गुंजाइश हमेशा छिपी रहती है। सफलता बस केवल एक ही बात पर निर्भर करती है और वो ये कि कभी हिम्मत मत हारिए। 
हम सभी काफी भाग्यशाली हैं कि हम वक्त के ऐसे दौर में हैं जब थ्योरेटिकल फिजिक्स में नई-नई खोजें सामने आ रही हैं। बीते 40 साल के दौरान ब्रह्मांड के बारे में हमारी जानकारी में बहुत ज्यादा बदलाव आया है और ब्रह्मांड को लेकर हमारी समझ पूरी तरह बदल चुकी है और मुझे खुशी है कि इसमें मैं भी थोड़ा सा योगदान दे सका। हम मानव, जो कि प्रकृति के आधारभूत कणों के एक समूह मात्र हैं, उन नियमों को समझ सके जो हर पल हमपर और इस ब्रह्मांड पर असर डाल रहे हैं, ये सच्चाई पूरी मानव जाति के लिए एक बहुत महान जीत है।    

वॉयेजर की खास प्रस्तुति

– संदीप निगम

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

एक जीनियस की मृत्यु...

18 अप्रैल 1955 को दुनिया ने महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन को खो दिया। करीब एक महीने बाद उनके करीबी मित्र मैक्स टालमड ने टाइम मैगजीन में एक संस्मरणात्मक लेख लिखकर आइंस्टीन को श्रद्धांजलि अर्पित की। ‘वॉयेजर’ अपने पाठकों के लिए 2 मई 1955 को टाइम मैगजीन में प्रकाशित ये पूरा लेख प्रस्तुत कर रहा है।



2 मई 1955

बेतरतीब सी शर्ट, बैगी पैंट और सिर पर नीली कैप पहने खुद से लापरवाह छोटे कद की एक शख्सियत 22 साल तक करीब हर सुबह न्यूजर्सी, प्रिंसटन की 112 वीं मर्सर स्ट्रीट में मौजूद अपने घर की सीढ़ियों से उतर कर भारी कदमों से पैदल चलते हुए इंस्टीट्यूट आप एडवांस स्टडीज की ओर जाती थी। पहली नजर में देखने पर ये लापरवाह सा व्यक्ति बगीचे की देखभाल करने वाले माली जैसा लगता था। उनके होठों पर कोमलता के साथ पाइप दबी रहती थी, सड़कों पर वो हमेशा किनारे की ओर सिमटे हुए से चलते थे और जब तक कुछ कहना बहुत जरूरी न हो वो खामोश ही रहते थे। लेकिन सिर पर बिखरे सफेद बालों और बेहद आत्मीय आंखों वाले इस शख्स की एक बहुत बड़ी विशेषता थी....वो एक जीनियस थे। उनकी बौद्धिकता प्रखरतम और कल्पनाशीलता विविधता से भरी थी। अल्बर्ट आइंस्टीन ने मानव जाति के प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान को एक अतुलनीय ऊंचाई प्रदान की और पदार्थ के रहस्य को सबसे ज्यादा गहराई के साथ समझा। आइंस्टीन से पहले किसी ने ब्रह्मांड के रहस्य को इतनी पूर्णता के साथ कभी नहीं समझा था।
प्रोफेसर आइंस्टीन के भारी कदमों की आहट पिछले हफ्ते से उनके प्रिय इंस्टीट्यूट के रास्तों और गलियारों में नहीं गूंज रही है। गॉल ब्लॉडर के इंफैक्शन, जिसे लेकर वो हमेशा लापरवाह रहते थे, ने उन्हें अस्पताल जाने पर मजबूर कर दिया। इंफैक्शन इतना बढ़ चुका है कि उनकी मुख्य धमनियों से खून रिसने लगा था। मध्यरात्रि से कुछ मिनट बाद वो जर्मन भाषा में कुछ बुदबुदाए, जिसे उनकी नर्स नहीं समझ सकी और इस तरह आधुनिक युग के महानतम वैज्ञानिक के अंतिम शब्द कहीं खो गए। रात 1 बजकर 15 मिनट पर 76 साल के अल्बर्ट आइंस्टीन का नींद में ही निधन हो गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर ने इस महानतम वैज्ञानिक के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा, “ 20 वीं शताब्दी के ज्ञान में किसी और शख्स ने इतना व्यापक योगदान नहीं दिया।”
सोवियत संघ के सरकारी अखबार प्रावदा ने उन्हें नेचुरल साइंस के महान रूपांतरकर्ता का विशेषण दिया।
इस्राइल के प्रधानमंत्री ने कहा, “ विश्व ने महानतम जीनियस को खो दिया।”
हजारों बहुत से श्रद्धांजलि संदेश भी आए, लेकिन कोई भी संदेश असली विश्व भावना को अभिव्यक्त नहीं कर सका। केवल उनके साथी और कुछ वैज्ञानिक ही ये समझ सके कि उनके न रहने से ज्ञान के विस्तार को कितनी बड़ी क्षति पहुंची है।

एक व्यक्ति के तौर पर अल्बर्ट आइंस्टीन बिल्कुल अलग थे, काफी हद तक एक बच्चे के जैसे। एक वैज्ञानिक के तौर पर उन्होंने इतिहास की चुनिंदा वैज्ञानिक हस्तियों पाइथागोरस, आर्किमिडीज, कोपरनिकस और न्यूटन से भी कहीं आगे का और युगांतरकारी विजन सामने रखा।
एक छोटा सा स्क्रैचपैड और एक पेंसिल आइंस्टीन के उपकरण बस यही थे, उनकी प्रयोगशाला उनकी कैप के नीचे थी। फिर भी वो एक सूक्ष्मदर्शी से ज्यादा गहराई और एक टेलिस्कोप से भी दूर तक झांकने में सफल रहे। गणित की मदद से उन्होंने वो चीज साबित कर के दिखा दी धार्मिक आस्थावान जिसके गीत प्राचीन काल से गाते रहे थे कि एक अदृश्य कण को संचालित करने वाले नियम ब्रह्मांड के विशालतम पिंड पर भी समान रूप से लागू होते हैं। आइंस्टीन के स्क्रैचपैड पर लिखे प्रमेयों (theorems) ने ज्ञान को सीमाओं के बंधन से मुक्त कर दिया और ब्रह्मांड के आधारभूत वैज्ञानिक नियम उन्होंने फिर से लिखे। एटॉमिक फिशन और हाइड्रोजन फ्यूजन के बदनाम मशरूम जैसे बादल, उनके अनैच्छिक स्मारक हैं। धरती को थर्रा देने वाली इस अपार ऊर्जा का इस्तेमाल मानवता की भलाई के लिए किया जाए यही उनकी सच्ची विरासत है।
वो आंतरिक बल जिसने आइंस्टीन को जीनियस बना दिया, आइंस्टीन मजाक में उसे प्रेत बाधा का नाम देते थे, कि मेरे ऊपर भूत सवार है...या फिर इसकी तुलना एक नौजवान प्रेमी जैसी जिद और उसके उत्साह से भरे जोश से करते थे। अदभुत वैज्ञानिक बौद्धिकता के बावजूद आइंस्टीन के स्वभाव में बिल्कुल एक बच्चे जैसी मासूमियत थी। रोजमर्रा की छोटी-बड़ी समस्याओं पर उनके चेहरे पर बिल्कुल किसी मेमने जैसी बेबसी छा जाती थी। अपने दो-मंजिला घर के लिए एकबार आइंस्टीन ने एक लिफ्ट खरीद ली, उनसे जब इसकी वजह पूछी गई तो उन्होंने मासूमियत से जवाब दिया कि इसे बेचने आया सेल्समैन मुझे इतना पसंद आया कि मैं उसे ना नहीं कह सका। उन्हें मजाक बहुत पसंद था और छोटी-छोटी बातों पर वो हंस देते थे। वो गहरे मानवतावादी थे, लेकिन ये भी सच है कि वो केवल उन चंद लोगों से ही खुल पाते थे जो उनके बेहद करीब थे। 1949 में आइंस्टीन ने लिखा था, “ सामाजिक न्याय में मेरा गहरा यकीन है, लेकिन दूसरे लोगों के साथ मैं उतनी गहराई के साथ घुल-मिल नहीं पाता हूं। मैं कभी अपने देश का नहीं रहा, मेरा घर...यहां तक कि मेरे परिवार के करीबी रिश्तेदारों के साथ भी मैं कभी पूरे दिल से करीबी नहीं महसूस कर सका।”
आइंस्टीन का परिवार जर्मनी के बावरिया राज्य में रहता था, जहां उनके पिता बिजली के उपकरण बेचने का काम करते थे। आइंस्टीन का जन्म जर्मनी के उल्म में 1879 में हुआ था। बचपन में उन्हें छोटे-छोटे गीत रचने का शौक था, जिन्हें वो अपने कमरे में गाते रहते थे। लेकिन स्कूल में वो एक शर्मीले और पिछड़े छात्र के तौर पर जाने जाते थे। उन्हें लेकर मां-बाप हमेशा परेशान रहते कि कहीं वो मंदबुद्धि तो नहीं? 12 बरस की उम्र में उन्हें किसी ने यूक्लिड की ज्योमिट्री की किताब दी। 30 साल बाद इसे याद करते हुए आइंस्टीन ने बताया, “ इस किताब से पहली बार महसूस हुआ कि केवल विचार की ताकत भी मानव को अदभुत क्षमतावान बना सकती है।” 13 बरस की उम्र में उन्होंने केंट की ‘क्रिटिक आफ प्योर रीजन’ पढ़ी, लेकिन फिरभी ज्यूरिख पॉलिटेक्निकम की परीक्षा पास करने के लिए उन्हें दो-दो बार कोशिश करनी पड़ी।
ग्रैजुएशन के बाद आइंस्टीन ने एक सर्बियाई गणितज्ञ मिलेवा मैरी से शादी कर ली और स्विटजरलैंड में सैटल हो गए। परिवार के सहयोग से उन्हें स्विस पेटेंट ऑफिस में एक्जामिनर का जॉब भी मिल गया। लेकिन वहां भी काम के बाच भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और प्रकृति के मूलभूत नियमों की गुत्थी को समझने की शुरुआत की। लेकिन इसमें वो इस कदर रम गए कि काम के बीच जब भी मौका मिलता वो अपनी डायरी और रद्दी कागज के टुकड़ों में नोट्स लिखने में जुट जाते। एक दिन शाम के वक्त वो दफ्तर से लौट रहे थे, तभी उन्होंने एक मां को देखा जो बच्चागाड़ी ले कर जा रही थी। अचानक उन्हें कुछ सूझा और वो वहीं थम गए, जेब से कागजों का पुलिंदा निकाला और गणितीय चिन्हों से भरी एक सिरीज लिखने में खो गए।
1905 में आइंस्टीन के पांच रिसर्च पेपर्स प्रकाशित हुए। इनमें से पांचवां रिसर्च पेपर जो कि सबसे छोटा था, उसने फिजिक्स की दुनिया बदल कर रख दी। ये पेपर इस पर आधारित था कि क्या किसी बॉडी का इनर्शिया उसके इनर्जी कॉन्सटेंट पर निर्भर होता है? आइंस्टीन के इस पेपर को आधुनिक परमाणु युग का गणितीय केंद्र समझा जाता है।
200 साल से भी ज्यादा वक्त तक न्यूटन के गति संबंधी नियमों को साइंस की दुनिया में सर्वोच्च समझा जाता था। माना जाता था कि न्यूटन के इन नियमों में न तो किसी सुधार की जरूरत है और न ऐसा किया जा सकता है। मान्यता थी कि ये नियम गैसों के व्यवहार से लेकर गर्मी की प्रकृति तक हर चीज की व्याख्या कर सकते हैं। लेकिन 1880 में जब कुछ और संवेदनशील उपकरण सामने आए, तो कुछ असंगत से तथ्य सामने आने लगे, खासतौर पर प्रकाश में। प्रकाश के बारे में कुछ ऐसी नई बातें पता चलीं जो न्यूटन के नियमों का खुलेआम उल्लंघन कर रहीं थीं। नए तथ्यों की रोशनी में न्यूटन के नियमों को समायोजित करने में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी चीज के अस्तित्व की अवधारणा सामने रखी जो पूरी तरह काल्पनिक थी, इसका नाम था – ईथर
न्यूटन की साख बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने तर्क गढ़ा कि जिस तरह हवा हर जगह मौजूद है, उसी तरह ईथर भी हर जगह मौजूद है और ये ईथर ही प्रकाश की तरंगों को अंतरिक्ष से यहां तक आने में मदद करता है। लेकिन प्रयोगों से जल्दी ही साबित हो गया कि ईथर जैसी किसी चीज का कोई अस्तित्व नहीं है। अब वैज्ञानिक एक अजीब दुविधा से घिर उठे, क्या वो न्यूटन के पुराने नियमों को जकड़े रहें या फिर उन नतीजों पर भरोसा करें जो उनके प्रयोगों से सामने आ रहे थे? फिजिक्स की दुनिया 20 साल तक इसी दुविधा से घिरी रही।
आइंस्टीन की गणनाओं ने फिजिक्स की ये दुविधा खत्म की। उन्होंने प्रकृति के अदभुत रहस्यों से पर्दा उठाया और वो भी इतने सीधे-सरल समीकरण से जो कि बिथोवन की पांचवीं धुन की तरह लोगों के दिलो-दिमाग पर छा गया, ये था - E=mc² । इस समीकरण का मतलब है कि एक ग्राम पदार्थ (जैसे एक चम्मच चीनी) (m) खुद में अपार ऊर्जा (E) छिपाए रखता है जो कि 1 सेकेंड में 1 सेंटीमीटर की प्रकाश की गति के वर्ग (c²) के बराबर होता है। इस समीकरण के साथ आइंस्टीन ने साबित किया कि अगर किसी चीज की गति बढ़ाई जाए, तो न केवल उसका वजन बढ़ने लगता है, बल्कि फिजिक्स के तमाम पैमाने भी बदलने लगते हैं। आइंस्टीन ने बताया, ‘द्रव्यमान कुछ और नहीं, बल्कि ऊर्जा का ही एक दूसरा स्वरूप है।’
साइंस की दुनिया में 2000 साल बाद, आइंस्टीन करीब-करीब रातोंरात एक जबरदस्त हलचल बनकर छा गए। एक स्विस पेटेंट क्लर्क दुनिया का सबसे मशहूर वैज्ञानिक बन गया, जिसे हासिल करने के लिए विश्वविद्यालयों में होड़ शुरू हो गई और अंत में 1912 में वो बर्लिन के मशहूर कैसर विल्हेल्म इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर बन गए। 1915 में आइंस्टीन ने अपने सिद्धांत का विस्तार किया और इस तरह ‘जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी’ सामने आई।
आइंस्टीन की नई कॉस्मिक अवधारणाओं का पहला प्रायोगिक प्रमाण 1919 के सूर्यग्रहण के वक्त सामने आया, जब वैज्ञानिकों ने प्रकाश किरणों को ठोस वस्तु के चारों ओर मुड़ते हुए देखा। 1921 में आइंस्टीन को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस मौके पर ब्रिटिश दार्शनिक बर्टरैंड रसल ने लिखा, “ आइंस्टीन की थ्योरी आफ रिलेटिविटी मानव ज्ञान की अब तक की सबसे महान उपलब्धि है। 2000 साल तक अर्जित फिजिक्स और गणित के ज्ञान की सीढ़ियों को चढ़कर ही हमने ये महान उपलब्धि हासिल की है। पाइथागोरस से लेकर रीमन तक की विशुद्ध ज्यॉमिट्री, गैलीलियो और न्यूटन की डायनामिक्स और एस्ट्रोनॉमी, फैराडे-मैक्सवेल और बाद में इनकी खोज को आगे बढ़ाने वाले इनके वारिसों की रिसर्च से सामने आने वाली थ्योरी आफ इलेक्ट्रो-मैग्नेटिज्म – आइंस्टीन के सिद्धांतों में आवश्यक संशोधनों के साथ ये सभी नियम और सिद्धांत समाहित हैं।”
आइंस्टीन ने एक बार इंटरव्यू लेने आए रिपोर्टर्स से कहा था, “मेरी जिंदगी बिल्कुल साधारण सी है, भला इसमें किसी को क्या दिलचस्पी होगी?” जर्मनी का ये महान विद्धान अमेरिका के लिए आश्चर्य का केंद्र था। अमेरिकियों ने उन्हें जीनियस कहा, क्योंकि वो अक्सर कहते थे कि मुझे पैसों की परवाह नहीं है। आइंस्टीन ने एक बार $1,500 की चेक को अपनी एक किताब में बुकमार्क बना डाला था। कुछ दिनों बाद जब ये किताब खो गई तो उनके एक मित्र ने चेक खो जाने का अफसोस जताया, इसपर आइंस्टीन ने कहा मुझे असली दिक्कत पढ़ने में हो रही है, मैं बुकमार्क के लिए दूसरी चेक के आने का इंतजार कर रहा हूं। वो हमेशा खुद में ही खोए रहते थे, अपने विचारों में गुम एक बार वो ट्रांसऐटलांटिक लाइनर के सैलून में घरल का पजामा पहने चले गए थे।
1952 में आइंस्टीन से इस्राइल का राष्ट्रपति बनने की पेशकश की गई थी, जिसे उन्होंने मुस्कराते हुए ठुकरा दिया। जब नाजियों ने यहूदियों पर अत्याचार की सीमाएं तोड़ दीं तब उन्होंने युद्ध का सबसे विनाशक हथियार को बनाने की सिफारिश की। 1939 को एक दिन आइंस्टीन ने राष्ट्रपति रूजवेल्ट को एक पत्र लिखा। उन्होंने इस पत्र में लिखा, “ नाजी वैज्ञानिक यूरेनियम की भारी मात्रा में जल्दी ही चेन रिएक्शन शुरू करने में सफल हो जाएंगे।”

इसके जवाब में रूजवेल्ट ने कहा, “इसके मद्देनजर हमें तुरंत कुछ करना चाहिए।”

… और इस तरह पहला नाभिकीय बम बनाने वाले मैनहट्टन प्रोजेक्ट की शुरुआत हो गई।

अल्बर्ट आइंस्टीन को जब हिरोशिमा पर एटम बम से हमले की जानकारी मिली, तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। ये ऐसी हकीकत थी वो जिसे मानने को तैयार ही नहीं थे। वो अपार दुख और क्षोभ से भर उठे। उन्हें गहरा धक्का लगा और वो बुदबुदाए – भयानक...बहुत ही भयानक !
बाद में आइंस्टीन ने कहा, “ अगर मैं जानता कि जर्मन एटम-बम कभी नहीं बना सकेंगे, तो मैं इस मुद्दे पर अपनी संस्तुति देना तो दूर, अपनी उंगली भी नहीं हिलाता।”
दुनिया के पहले नाभिकीय हथियार को विकसित करने के मुद्दे पर 10 दिसंबर 1945 को एक व्याख्यान के जरिए आइंस्टीन ने अपना नजरिया दुनिया के सामने रखा। आइंस्टीन के इस व्याख्यान का शीर्षक था – ‘द वॉर इज वन, बट पीस इज नॉट।’
इस व्याख्यान में आइंस्टीन ने कहा, “ इस नए हथियार को विकसित करने में हमने मदद की, क्योंकि हम नहीं चाहते थे कि इंसानियत के दुश्मन इसे हमसे पहले हासिल कर लें। कल्पना से परे तबाही और बर्बादी मचाना और शेष विश्व को अपना गुलाम बनाना ही हमेशा से नाजियों की मानसिकता रही है। हमने ये नया हथियार अमेरिकी और ब्रिटिश जनता के हाथों में, उन्हें संपूर्ण मानवजाति का प्रतिनिधि और शांति तथा स्वाधीनता का संरक्षक मानते हुए सौंपा है। लेकिन शांति तथा स्वाधीनता की वो गारंटी, जिसका वादा अटलांटिक चार्टर के देशों से किया गया था, हमें अब तक देखने को नहीं मिली है। जंग जरूर जीत ली गई है...लेकिन शांति नहीं...दुनिया को भय से मुक्ति दिलाने का वादा किया गया था, लेकिन असलियत में जब से जंग खत्म हुई है डर कई गुना और बढ़ गया है। दुनिया से वादा किया गया था कि रोजमर्रा की चीजों की तमाम किल्लतें-तमाम दिक्कतें सब खत्म हो जाएंगी। लेकिन दुनिया का ज्यादातर हिस्सा भुखमरी का शिकार है, जबकि दूसरे जरूरत से ज्यादा चीजों का लुत्फ उठा रहे हैं।”

मैक्स टलमड, आइंस्टीन के करीबी मित्र और भौतिकशास्त्री

टाइम मैगजीन - 2 मई 1955

रविवार, 15 जनवरी 2012

ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई – प्रो. हॉकिंग

हम अपने पाठकों के लिए एक और विचारोत्तेजक सामग्री लेकर आए हैं। इस बार प्रस्तुत है, प्रो. स्टीफन हॉकिंग के मशहूर व्याख्यान ओरिजिन आफ यूनिवर्स का पूर्ण अनुवाद। प्रो. हॉकिंग ने 13 मार्च 2007 में यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया, बर्कले में छात्रों को संबोधित करते हुए ये मशहूर व्याख्यान दिया था, जो बाद में उनकी एक किताब का आधार भी बना। पेश है वॉयेजर के पाठकों के लिए एक खास प्रस्तुति।
हम यहां क्यों हैं ? हम कहां से आए हैं ? सेंट्रल अफ्रीका के बोशोंगो लोगों के मुताबिक, मानव जाति के आगमन से पहले दुनिया में केवल तीन चीजें थीं, गहरा अंधेरा, पानी और महान देवता बुंबा। एक दिन बुंबा के पेट में तेज दर्द उठा जिससे उन्हें उल्टी हुई। इस उल्टी के साथ सूरज बाहर निकल पड़ा। सूरज की तेज गर्मी से कुछ पानी सूख गया, जिससे जमीन सामने आई। लेकिन पेट से सूरज के निकलने के बावजूद बुंबा की तबीयत ठीक नहीं हुई और एक के बाद उल्टियों के साथ उनके मुंह से चंद्रमा, सितारे और उसके बाद तेंदुए, मगरमच्छ, कछुए और अंत में मानव निकल पड़े।
सृष्टि और जीवन की शुरुआत को लेकर अलग-अलग संस्कृतियों में प्रचलित मिथकों में से ये भी एक मिथ है। लेकिन ये सभी मिथक ऐसे बहुत से सवालों से जूझते रहे हैं, जिनके जवाब तलाशने की कोशिश हम अब भी कर रहे हैं। अब जाकर हम पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि इन मूलभूत सवालों के जवाब पौराणिक संदर्भों में नहीं बल्कि साइंस में छिपे हैं। अपने अस्तित्व से जुड़े रहस्यों की बात करें तो इसके पहले वैज्ञानिक साक्ष्य की खोज करीब 92 साल पहले की गई थी, जब 1920 में एडविन हब्बल ने लॉस एंजिल्स काउंटी में मौजूद माउंट विल्सन ऑब्जरवेटरी के 100 इंच टेलिस्कोप से अपने मशहूर ऑब्जरवेशंस की शुरुआत की थी। आकाशगंगाओं से आ रही रोशनी को माप कर हब्बल उनकी गति की गणना कर सके। उन्होंने देखा कि कुछ आकाशगंगाएं हमारे पास आ रही हैं, जबकि कुछ हमसे दूर छिटकती चली जा रही हैं। हब्बल ये देखकर आश्चर्य से भर उठे थे कि करीब सभी आकाशगंगाएं गतिशील हैं। उन्होंने देखा कि ज्यादा फासले वाली आकाशगंगाएं ज्यादा तेज गति से दूर भाग रही हैं। गतिशील और लगातार फैलते जा रहे ब्रह्मांड की खोज 20वीं सदी की सबसे महान खोज है। इस खोज ने ब्रह्मांड के बारे में सदियों से जारी बहस की दिशा ही मोड़ दी। लोग अब ये सोंचने पर मजबूर हो गए कि क्या ब्रह्मांड की कोई शुरुआत भी थी? अगर आकाशगंगाएं आज दूर भाग रही हैं, तो शायद कल वो एक-दूसरे के करीब थीं। अगर उनकी गति स्थिर थी, तो अलमारी में तहाकर रखे गए कपड़ों की तरह, अरबों साल पहले उन्हें एक-दूसरे के ऊपर होना चाहिए था। क्या ब्रह्मांड की शुरुआत इसी तरह से हुई ?
ब्रह्मांड की शुरुआत का विचार लोगों को कभी ठीक नहीं लगा। उदाहरण को तौर पर मशहूर यूनानी दार्शनिक अरस्तु को यकीन था कि ब्रह्मांड का अस्तित्व शाश्वत है। अमरता का विचार हमेशा से लोगों को कहीं ज्यादा विश्वसनीय लगता है, बजाय इसके कि किसी चीज का निर्माण हुआ। निर्माण या शुरुआत का विचार इसलिए भी अखरता था क्योंकि उस वक्त लोग इसकी तुलना बाढ़ या दूसरी प्राकृतिक आपदाओं से बर्बाद होते शहरों और फिर से उनके पुनर्निर्माण से करते थे। यानि अगर ब्रह्मांड की शुरुआत हुई है, तो इसका मतलब ये भी हुआ कि इससे पहले उसका खात्मा हो चुका था। शाश्वत ब्रह्मांड में यकीन की वजह धार्मिक भी थी, कोई इस विश्वास को तोड़ना नहीं चाहता था कि एक सर्वशक्तिमान बाहरी एजेंसी ‘ईश्वर’ ने ब्रह्मांड को उत्पन्न किया और इसे वर्तमान शक्ल बक्श दी।
अब अगर आप कहें कि ब्रह्मांड की शुरुआत हुई थी, तो तुरंत ये सवाल उठेगा कि उस शुरुआत से पहले क्या हुआ था ? मैं पूछना चाहूंगा कि इस ब्रह्मांड को रचने से पहले ईश्वर क्या कर रहा था? क्या वो ऐसे सवाल पूछने वाले लोगों के लिए नर्क तैयार करने में व्यस्त था ? ब्रह्मांड की शुरुआत हुई या नहीं जर्मन दार्शनिक इमानुएल कांट के लिए ये बहुत बड़ा सवाल था। उनका मानना था कि दोनों ही मान्यताओं में कई तार्किक अंतरविरोध मौजूद हैं। अगर मान लें कि ब्रह्मांड की शुरुआत हुई थी, तो फिर उसने शुरुआत के लिए अनंत काल तक इंतजार क्यों किया ? कांट ने इसे ‘थेसिस’ का नाम दिया। दूसरी तरफ, अगर ब्रह्मांड का वजूद शाश्वत काल से है, तो फिर वर्तमान स्थिति तक आने के लिए इसने अनंत समय क्यों लिया? कांट ने इस विचार को ‘एंटीथेसिस’ कहा। ‘थेसिस’ और ‘एंटीथेसिस’ दोनों ही कांट की परिकल्पनाएं थीं, जैसा कि उस वक्त के और भी लोगों का मानना था कि समय निरपेक्ष और अपरिवर्तनशील है। यानि समय अनंत भूतकाल से होते हुए अनंत भविष्य की ओर बढ़ा चला जा रहा है। लोगों का मानना था कि समय इससे अप्रभावित है कि उसकी पृष्ठभूमि में किसी ब्रह्मांड का अस्तित्व है या नहीं।
समय की निरपेक्ष तस्वीर अब भी कई वैज्ञानिकों को लुभाती है। 1915 में आइंस्टीन ने ‘जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी’ का क्रांतिकारी सिद्धांत पेश किया। इसके बाद स्पेस और टाइम किसी घटना के लिए स्थिर बैकग्राउंड जैसे अपरिवर्तनशील और निरपेक्ष नहीं रह गए। इसके बजाय वो बेहद प्रभावशाली मात्राएं बन गईं ब्रह्मांड में जिनकी रूपरेखा पदार्थ और ऊर्जा से तय होती है। स्पेस और टाइम की व्याख्या केवल ब्रह्मांड के भीतर ही मुमकिन है, इसलिए ब्रह्मांड के जन्म से पहले टाइम की बात करना बिल्कुल बेमानी हो गया।
उस वक्त, ब्रह्मांड की शुरुआत के विचार से बहुत से वैज्ञानिक खुश नहीं थे, क्योंकि लग रहा था कि फिजिक्स के नियम ढह जाएंगे। अब समाधान के लिए बाहरी एजेंसी की मदद की जरूरत महसूस होने लगी, जिसे आप सुविधा के लिए ‘ईश्वर’ पुकार सकते हैं। अब तो बस ये ‘ईश्वर’ ही बता सकता था कि ब्रह्मांड की शुरुआत कैसे हुई ? ब्रह्मांड की शुरुआत की कल्पना भी उन दिनों बेहद मुश्किल थी, लेकिन हब्बल के नतीजे झुठलाए नहीं जा सकते थे। इसलिए कुछ ऐसे तर्क गढ़े गए कि ठीक है वर्तमान में ब्रह्मांड फैल रहा है, लेकिन इसकी शुरुआत कभी नहीं हुई। इस सिलसिले में सबसे मजबूत तर्क 1948 में ‘स्टडी स्टेट थ्योरी’ के नाम से सामने आया। ‘स्टडी स्टेट थ्योरी’ के मुताबिक ब्रह्मांड हमेशा से था और हमेशा ऐसा ही नजर आता रहेगा। लेकिन इस थ्योरी का परीक्षण नहीं किया जा सकता था, इसलिए ये अवैज्ञानिक बात ज्यादा लंबे समय तक नहीं चल सकी।
ब्रह्मांड की शुरुआत हुई थी, इस सिद्धांत को खारिज करने के लिए एक और जबरदस्त कोशिश की गई। एक सुझाव ये रखा गया कि ब्रह्मांड का एक शुरुआती संकुचन काल भी था। लेकिन लगातार घूर्णन और कुछ दूसरी असमानताओं के कारण सारा पदार्थ एक ही जगह इकट्ठा नहीं रह सका, बल्कि पदार्थ के अलग-अलग हिस्से हो गए और अनंत घनत्व के साथ ब्रह्मांड का विस्तार एक बार फिर होगा। दरअसल ये दावा दो रूसी वैज्ञानिकों लिफशिट्ज और ख्लातनिकोव का था, कि उन्होंने साबित कर दिया है कि असमानताओं के साथ होने वाला असंतुलित संकुचन, घनत्व को अपरिवर्तित रखते हुए हमेशा एक उछाल की ओर ले जाएगा। मार्क्सवादी-लेनिनवादी तार्किक भौतिकवाद के लिए ये नतीजे काफी सुविधाजनक थे, क्योंकि इनसे ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में असुविधाजनक सवाल टाले जा सकते थे। इसलिए ये तर्क सोवियत वैज्ञानिकों के लिए ‘आर्टिकिल आफ फेथ’ बन गया।
लिफशिट्ज और ख्लातनिकोव ने जब अपना ये दावा प्रकाशित कराया, उस वक्त मैं महज 21 वर्षीय शोध छात्र था और अपनी पीएचडी थीसिस पूरी करने के लिए ‘कुछ’ तलाश कर रहा था। उनके तथाकथित सबूत पर मैंने विश्वास नहीं किया और रोजर पेनरोज के साथ मिलकर इस सवाल का अध्ययन करने के लिए गणित के एक नए समीकरण को विकसित करने में जुट गया। हमने साबित कर दिखाया कि ब्रह्मांड किसी गेंद की तरह उछल नहीं सकता, जैसा कि रूसियों को यकीन था। रोजर पेनरोज के साथ मैंने ये दिखाया कि अगर आइंस्टीन की जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी सही है, तो एक सिंगुलैरिटी की स्थिति भी होनी चाहिए, यानि अनंत घनत्व और स्पेस-टाइम कर्वेचर वाला एक ऐसा बिंदु, जहां से समय की शुरुआत होती है।
एक बेहद सघन शुरुआत के साथ ब्रह्मांड का जन्म हुआ, हमारे इस विचार के पक्ष में सबसे ठोस ऑब्जर्वेशन सबूत मेरे पहले सिंगुलैरिटी नतीजों के कुछ महीने बाद, अक्टूबर 1965 में सामने आए। जब हमने पूरे अंतरिक्ष में माइक्रोवेव बैकग्राउंड के धुंधले से अवशेष ढूंढ़ निकाले। ये माइक्रोवेव बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी कि आपकी रसोई में रखे माइक्रोवेव ओवन में होती है, लेकिन ये ओवन जैसी शक्तिशाली नहीं बल्कि काफी कमजोर थी। ब्रह्मांड की इस माइक्रोवेव से आपका पिज्जा बस शून्य से 271 दशमलव 3 डिग्री सेंटीग्रेड तक ही गर्म हो सकता है। अंतरिक्ष की इस माइक्रोवेव में पिज्जा पकाने के बारे में सोंचना बेकार है। दरअसल, अंतरिक्ष की इस माइक्रोवेव को आप खुद भी देख सकते हैं, अपने टीवी को किसी खाली चैनल पर सेट कर दीजिए, अब स्क्रीन पर आप जो ‘स्नो’ जैसी चीज देखेंगे उसमें कुछ फीसदी हिस्सेदारी इस माइक्रोवेव की भी है। अंतरिक्ष के बैकग्राउंड में ये माइक्रोवेव रेडिएशन कहां से आया? इसका बस एक ही जवाब था कि ये रेडिएशन शुरुआती बेहद गर्म और सघन स्थिति का ही अवशेष है। जैसे-जैसे ब्रह्मांड का विस्तार होता गया, रेडिएशन ठंडा होता चला गया और अब ये अवशेष के रूप में मौजूद है।
हालांकि पेनरोज और मेरी बनाई सिंगुलैरिटी थ्योरम्स, ये बताती थीं कि ब्रह्मांड की एक शुरुआत भी थी, लेकिन हमारी ये थ्योरम ये नहीं बताती थी कि इसकी शुरुआत आखिर हुई कैसे? सिंगुलैरिटी प्वाइंट पर जनरल रिलेटिविटी के समीकरण ढह जाएंगे, इसलिए आइंस्टीन की थ्योरी ये नहीं बता सकती कि ब्रह्मांड की शुरुआत कैसे हुई? बल्कि, ये केवल ये बता सकती है कि एक बार शुरुआत हो जाने के बाद ब्रह्मांड किस तरह लगातार विकसित होता गया। अब लोगों के सामने दो रास्ते थे, पहला रास्ता उस तार्किक नतीजे की ओर ले जाता था जिसे पेनरोज और मैंने खोजा था। और दूसरा रास्ता सर्वशक्तिमान ईश्वर की ओर जाता था, कि उसने इस ब्रह्मांड की रचना कुछ ऐसे उद्देश्यों के लिए की जिसे हम मानव नहीं समझ सकते। ये नजरिया पोप जॉन पॉल का था।
वैटिकन में कॉस्मोलॉजी के एक कान्फ्रेंस में पोप ने प्रतिभागियों से कहा कि शुरुआत के बाद ब्रह्मांड का अध्ययन करना ठीक है, लेकिन ब्रह्मांड की शुरुआत के बारे में जांच-पड़ताल नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि ये सृष्टि की रचना का पल था, ये सर्वशक्तिमान ईंश्वर का विधान था, जो उस पल काम कर रहा था। मुझे खुशी है, कि वो नहीं समझ सके कि उसी कांफ्रेंस में मैंने एक पेपर प्रजेंट किया था, जिसमें मैंने बताया था कि इस ब्रह्मांड की शुरुआत कैसे हुई। शुक्र है कि गैलीलियो की तरह मुझे धार्मिक न्यायाधिकरण के सामने पेश होकर कार्यवाही का सामना नहीं करना पड़ा।
हमारे काम की एक और व्याख्या, जिसका समर्थन ज्यादातर वैज्ञानिकों ने किया है, वो ये है कि ब्रह्मांड के शुरुआती स्वरूप में मौजूद बेहद शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र की वजह से जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी ढह गई थी। उस पल, एक ऐसी थ्योरी ने इसकी जगह ले ली थी जो कहीं ज्यादा पूर्ण थी। आपको ये स्वाभाविक भी लग सकता है, क्योंकि जनरल रिलेटिविटी पदार्थ की सूक्ष्म संरचनाओं पर ध्यान ही नहीं देती। वहां क्वांटम थ्योरी का बोलबाला है। सामान्यतौर पर इसका कुछ खास मतलब नहीं है, क्योंकि माइक्रोस्कोपिक स्तर पर काम करने वाली क्वांटम थ्योरी के मुकाबले ब्रह्मांड का आकार अतुलनीय विस्तार वाला है। लेकिन जबकि ब्रह्मांड एक सेंटीमीटर के अरबों-खरबों गुना प्लांक आकार के विस्तार वाला है, यहां दोनों स्केल एकसमान हो जाते हैं और क्वांटम थ्योरी प्रभाव में आ जाती है।
ब्रह्मांड के उदभव को समझने के लिए हमें जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी को क्वांटम थ्योरी के साथ मिलाने की जरूरत है। ‘सम ओवर हिस्टिरीज’ का फेनमैन का आइडिया, ऐसा करने का सबसे बढ़िया तरीका नजर आता है। रिचर्ड फेनमैन विविधताओं से भरे काफी रंगीले इंसान थे। वो पैसाडीना के एक स्ट्रिप ज्वाइंट में बोंगो ड्रम्स भी बजाते थे और कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी में ब्रिलियंट फिजिसिस्ट भी थे। उन्होंने बताया कि कोई सिस्टम स्थिति A से स्थिति B तक जाने में हर मुमकिन रास्ते या ‘हिस्ट्री’ की मदद लेता है।
आइंस्टीन की जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी ने टाइम और स्पेस को स्पेस-टाइम के रूप में एकसाथ जोड़ दिया। लेकिन टाइम स्पेस से अलग है, ये एक गलियारे के जैसा है, जिसकी या तो एक शुरुआत होती है और एक अंत, या फिर वो हमेशा के लिए गतिमान रहता है। बहरहाल, जब कोई जनरल रिलेटिविटी को क्वांटम थ्योरी के साथ मिलाता है, जैसा कि जिम हर्टल और मैंने किया, तो हमने देखा कि चरम स्थितियों में टाइम, स्पेस में एक दूसरी दिशा की तरह बर्ताव करने लगता है।
मैंने और जिम हर्टल ने ब्रह्मांड की रचना खुद-ब-खुद और सूक्ष्म स्तर से (the spontaneous quantum creation of the universe) होने की जो तस्वीर विकसित की है, वो काफी हद तक खौलते पानी की ऊपरी सतह पर बनते-बिगड़ते भाप के बुलबुलों जैसी है। खौलते पानी की सतह को ध्यान से देखिए, वहां भाप के कई सारे छोटे-बड़े बुलबुले बनते-बिगड़ते नजर आएंगे। छोटे बुलबुले अगले ही पल खत्म हो जाते हैं, जबकि कुछ बड़े बुलबुले लंबे समय तक खुद को बचा ले जाते हैं। आइडिया ये है कि ब्रह्मांड की सबसे संभावित ‘हिस्ट्रीज’ इन बुलबुलों के सतह के जैसी होगी। बहुत से छोटे बुलबुले बनेंगे, लेकिन वो अगले ही पल गायब भी हो जाएंगे। इन्होंने एक सूक्ष्म ब्रह्मांड को विस्तार देने में योगदान तो दिया, लेकिन फिर से खत्म भी हो गए, क्योंकि इनका आकार बेहद छोटा था। इन्हें संभावित वैकल्पिक ब्रह्मांड कहा जा सकता है, लेकिन ये कोई खास महत्व के नहीं थे, क्योंकि ये उतनी देर तक अपना अस्तित्व बनाए नहीं रख सके ताकि आकाशगंगाओं, सितारों और किसी बुद्धिमान सभ्यता को जन्म दे सकें। इन नन्हें बुलबुलों में से कुछ ने अपना आकार इतना बढ़ा लिया कि वो फिर से फूट जाने से खुद को बचा सकें। लगातार बढ़ती रफ्तार के साथ इन बुलबुलों का फैलना जारी है, हमारा ब्रह्मांड भी ऐसा ही एक बुलबुला है, जिसमें हम रह रहे हैं।
पिछले सौ साल में कॉस्मोलॉजी ने बहुत शानदार विकास किया है। द जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी और ब्राह्मांड के लगातार फैलने की खोज ने ब्रह्मांड की अनादि और अनंत वाली पुरानी तस्वीर उखाड़ फेंकी है। जनरल रिलेटिविटी तो कहती है कि ब्रह्मांड और खुद समय की शुरुआत भी बिगबैंग में हुई थी। इसका एक आंकलन ये भी है कि ब्लैकहोल्स में खुद समय का भी खात्मा हो जाएगा। कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड और ब्लैक होल्स के ऑब्जरवेशंस से इन गणनाओं की पुष्टि हुई है। ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ और खुद वास्तविकता को समझने में ये बहुत बड़ा योगदान है।
हालांकि जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी का आंकलन है कि भूतकाल में पीरियड आफ हाई करवेचर से ब्रह्मांड आया होगा। लेकिन ये नहीं बताती कि ब्रह्मांड बिगबैंग से उत्पन्न कैसे हुआ? इसलिए जनरल रिलेटिविटी अपने आप में कॉस्मोलॉजी के इस केंद्रीय सवाल का जवाब नहीं दे सकती कि ब्रह्मांड जैसा दिखता है, वैसा क्यों है? लेकिन अगर जनरल रिलेटिविटी को क्वांटम थ्योरी के साथ मिला दिया जाए, तो ये बताना संभव है कि ब्रह्मांड की शुरुआत कैसे हुई।
बिगबैंग के साथ ब्रह्मांड का जन्म हुआ और अगले ही क्षण से ये फैलने लगा। हम ये जान चुके हैं कि शुरुआती ब्रह्मांड का विस्तार बेहद तीव्र गति के साथ हुआ। सेकेंड के बेहद सूक्ष्म हिस्से भर में ब्रह्मांड का आकार दोगुना हो गया था। लगातार प्रसार से ब्रह्मांड का आकार बहुत विशाल हो गया और निर्माण-पुर्ननिर्माण प्रक्रिया से आकाशगंगाएं समायोजित होने लगीं। हालांकि ये पूरी तरह से एक जैसा नहीं था, अलग-अलग जगहों पर विभिन्नताएं भी नजर आने लगीं। इन विभिन्नताओं से शुरुआती ब्रह्मांड के तापमान में हल्के अंतर का जन्म हुआ, जिसे हम कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड में देख सकते हैं।
तापमान में इस अंतर का मतलब ये था कि ब्रह्मांड के कुछ इलाकों के विस्तार की गति कुछ कम है। धीमी गति वाले इन इलाकों का विस्तार थम गया और पुर्निनिर्माण की प्रक्रिया से वहां आकाशगंगाओं और सितारों ने जन्म लिया और इस तरह वहां बाद में सौरमंडल भी बनने लगे। उस आदि ब्रह्मांड के वक्त से लेकर अब तक ब्रह्मांड के कोने-कोने से गुरुत्व तरंगें निर्बाध विचरण करती हुई हम तक पहुंच रही हैं। जबकि इसके विपरीत, प्रकाश मुक्त इलेक्ट्रॉन्स कि जरिए कई बार बिखरता रहता है और रोशनी का ये बिखराव तब तक जारी रहता है, जब तक कि तीन लाख साल बाद इलेक्ट्रॉन्स फ्रीज नहीं हो जाते।
कई असाधारण सफलताओं के बावजूद, सारे समाधान नहीं मिले हैं। हमें अब तक इस बात के अच्छे ऑब्जर्वेशनल सबूत नहीं मिले हैं कि धीमे पड़ने की लंबी अवधि के बाद ब्रह्मांड का फैलाव एक बार फिर तेज हो रहा है। ऐसी जानकारियों के बिना, हम ब्रह्मांड के भविष्य के बारे में सुनिश्चित नहीं रह सकते। क्या ये हमेशा के लिए फैलता रहेगा? क्या फूलते जाना या प्रसार प्रकृति का नियम है? या फिर, क्या ब्रह्मांड एक बार फिर से नष्ट हो जाएगा? नए ऑब्जरवेशनल नतीजे और सिद्धांत इन सवालों के जवाब तेजी से तलाश रहे हैं। कॉस्मोलॉजी एक बहुत जोशीला और सक्रियता से भरा विषय है।
हमारा अस्तित्व ब्रह्मांड की इन विभिन्नताओं से सीधे-सीधे जुड़ा हुआ है। अगर शुरुआती ब्रह्मांड पूरी तरह एक जैसा और बिना किसी हलचल वाला होता तो न तो सितारे जन्म लेते और न आकाशगंगाएं बनतीं। ऐसे में जीवन की शुरुआत और उसका विकास कैसे होता? हमारी संपूर्ण मानव जाति और जीवन के ये विभिन्न स्वरूप सब के सब बिगबैंग के बाद ब्रह्मांड की उसी आदि हलचल की ही देन हैं। अब भी हम युगों पुराने इन महान सवालों के जवाब की तलाश में आगे बढ़ रहे हैं और उत्तर के बेहद करीब तक भी जा पहुंचे हैं, कि हम यहां क्यों हैं ? हम कहां से आए हैं ? सवाल ये भी, कि ये सवाल पूछने वाले क्या हम अकेले हैं?

सोमवार, 9 जनवरी 2012

ब्लैकहोल को समझने में मुझसे भूल हुई – प्रो. हॉकिंग


 70 वें जन्मदिन पर प्रो. डॉ.स्टीफन हॉकिंग का खास इंटरव्यू
जवानी के दिनों में उन्हें घुड़सवारी बेहद पसंद थी। ऑक्सफोर्ड में वो नौकायन टीम के सदस्य थे और जब भी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई-लिखाई से ऊब जाते दोस्तों के साथ नौकायन पर निकल पड़ते थे। लेकिन बीमारी का पहला लक्षण तब सामने आया जब वो दाखिला लेने के लिए कैंब्रिज यूनिवर्सिटी गए। वो यूनिवर्सिटी की सीढ़ियां चढ़ रहे थे कि अचानक खुद से नियंत्रण खो बैठे और लुढ़कते हुए नीचे आ गए, इससे उन्हें सिर पर गहरी चोट लगी। सिर की चोट से कहीं पढ़ाई-लिखाई पर असर न पड़े, इसलिए घबराकर उन्होंने मेन्सा टेस्ट कराया। लेकिन मोटर न्यूरॉन डिजीज की पहचान तब हुई जब वो 21 साल के थे, उनके पहले विवाह से ठीक पहले। डॉक्टरों ने बुरी खबर सुनाई कि अब वो बस दो या तीन साल के ही मेहमान हैं। आहिस्ता-आहिस्ता अनकी बाहों और पैरों ने काम करना बंद कर दिया। 1985 में वो जब सेर्न प्रयोगशाला के दौरे पर थे, तभी उन्हें निमोनिया हो गया, उनकी स्थिति इतनी संवेदनशील थी कि साधारण सा निमोनिया भी जीवन के लिए खतरा बन गया और उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगी। इस निमोनिया के असर से वो बोलने की क्षमता भी खो बैठे। तब से इलेक्ट्रॉनिक वॉइस सिंथेसाइजर की आवाज ही उनकी आवाज बन गई और 2009 में वो पूरी तरह से पैरालाइज्ड हो गए। लेकिन ये बीमारी उनके दिमाग को सोचने-समझने से नहीं रोक सकी और व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे उन्होंने ब्रह्मांड के अनोखे रहस्य परत-दर-परत दुनिया के सामने खोल कर रख दिए। इस अनोखे वैज्ञानिक का नाम है प्रो. डॉ.स्टीफन हॉकिंग। प्रो. हॉकिंग की बीमारी सामान्य नहीं, इस रोग के जिस दूसरे रोगी का रिकॉर्ड मेडिकल साइंस के पास है वो बस 39 साल की उम्र तक ही जी सका था। लेकिन सृष्टि के रहस्यों को जानने-समझने की अदभुत जिज्ञासा और जबरदस्त इच्छाशक्ति के बदौलत प्रो. हॉकिंग ने हाल में 70 वां जन्मदिन मनाया है। प्रो. डॉ.स्टीफन हॉकिंग के 70 वें जन्मदिन पर ब्रिटिश साइंस जर्नल न्यू साइंटिस्ट ने उनका खास इंटरव्यू लिया। वॉयेजर के पाठकों के लिए ये इंटरव्यू प्रस्तुत है। संदर्भों का समझने में आसानी हो, इसलिए हमने साथ में सभी प्रमुख साइंस टर्म्स और सिद्धांतों को आसान शब्दों में देने की कोशिश भी की है।
सवाल आपके पूरे करियर के दौरान फिजिक्स की ऐसी कौन सी खोज थी, जिसने आपको उत्साह से भर दिया
प्रो. हॉकिंग कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड के तापमान में हल्के से अंतर की सेटेलाइट कोबे की खोज और बाद में मिशन डब्लूमैप के आंकड़ों से इसकी पुष्टि होना, मैं इसे अपने वक्त की साइंस की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक कहूंगा। इससे लगातार प्रसार कर रहे  ब्रह्मांड के सिद्धांत को शानदार बल मिला। इस सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड के प्रसारित होने से गुरुत्वाकर्षण की तरंगें फूटती हैं, मुझे उम्मीद है कि सेटेलाइट प्लांक इन गुरुत्व तरंगों को पकड़ने में कामयाब रहेगा। ये क्वांटम ग्रैविटी की सबसे शानदार इबारत साबित होगी जो अंतरिक्ष के आर-पार लिखी हुई है।
संपादक ब्रह्मांड की उत्पत्ति यानि बिगबैंग की घटना के अवशेष, माइक्रोवेव रेडिएशन के रूप में अब भी अंतरिक्ष में मौजूद हैं, बिगबैंग के इन अवशेषों को ही कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड या सीएमबी कहते हैं। इन्हें पकड़ने के लिए नासा ने पूरी तरह कॉस्मोलॉजी को समर्पित एक खास मिशन द कॉस्मिक बैकग्राउंड एक्सप्लोरर या कोबे 1989 को अंतरिक्ष भेजा था। कोबे मिशन ने जब बिगबैंग के आफ्टरग्लो यानि कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड को पकड़ लिया तो विज्ञान की दुनिया में सनसनी सी दौड़ गई। ये इस बात का सीधा सबूत था कि बिगबैंग का सिद्धांत सही है और उत्पत्ति के बाद से ही ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है। नासा ने इसकी अगली कड़ी और कोबे के नतीजों को क्रॉसचेक करने के लिए एक दूसरा मिशन विलकिन्सन माइक्रोवेव एनीसोट्रॉपी प्रोब जो डब्लूमैप के नाम से भी मशहूर हुआ, को 2001 में अंतरिक्ष भेजा। मिशन डब्लूमैप ने भी कोबे के नतीजों की पुष्टि कर दी। इससे लगातार प्रसारित होते या फैलते ब्रह्मांड के सिद्धांत को जबरदस्त बल मिला। इन नतीजों से हम जान सके कि सीएमबी के रूप में बिगबैंग के अवशेष पूरे अंतरिक्ष में बिखरे हुए हैं। पूरे अंतरिक्ष का तापमान करीब एक सा ही है, लेकिन स्पेस-टाइम में मौजूद सिकुड़न को जब फैलता ब्रह्मांड सीधा करता है तो इससे गुरुत्वाकर्षण की तरंगें फूटती हैं और अंतरिक्ष के तापमान में हल्का सा अंतर आ जाता है। मिशन कोबे और डब्लूमैप ने सीएमबी के साथ अंतरिक्ष के तापमान में इस हल्के अंतर को भी पकड़ा था। और इसी के साथ साबित हो गया कि बिगबैंग सिद्धांत सही है। स्पेसक्राफ्ट प्लांक एक स्पेस ऑब्जरवेटरी है, जिसे यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने 2009 को अंतरिक्ष भेजा था। दो साल से काम कर रही ऑब्जरवेटरी प्लांक अंतरिक्ष में सभी दिशाओं में सीएमबी पकड़ रही है, वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि प्लांक ब्रह्मांड के फैलने से पैदा होने वाली गुरुत्वाकर्षण तरंगों को भी पकड़ने में कामयाब रहेगा।   
सवाल आइंस्टीन ने कॉस्मोलॉजिकल कॉन्सटेंट को अपनी सबसे बड़ी भूल करार दिया था। आपकी सबसे बड़ी भूल क्या है ?
प्रो. हॉकिंग मैं समझता था कि सूचनाएं (information) ब्लैकहोल में जाकर नष्ट हो जाती हैं। लेकिन एंटी डि सिटर/ कन्फॉर्मल फील्ड थ्योरी करेस्पान्डेंस’ (AdS/CFT correspondence) ने मुझे अपने विचार बदलने पर मजबूर कर दिया। ये मेरी सबसे बड़ी भूल, कम से कम साइंस में सबसे बड़ी भूल थी।
संपादक सबसे पहले बात कॉस्मोलॉजिकल कॉन्सटेंट की। फिजिकल कॉस्मोलॉजी में कॉस्मोलॉजिकल कॉन्सटेंट ग्रीक अक्षर लैम्डा (Λ) से अभिव्यक्त किया जाता है। कॉस्मोलॉजिकल कॉन्सटेंट अल्बर्ट आइंस्टीन की देन है, उन्होंने अपनी जनरल रिलेटिविटी की ओरीजनल थ्योरी में ब्रह्मांड की स्थिरता को गणितीय रूप से साबित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया था। क्योंकि आइंस्टीन मानते थे कि ब्रह्मांड स्थिर है। बाद में एडविन हब्बल के मशहूर प्रयोग हब्बल रेडशिफ्टसे साबित हो गया कि ब्रह्मांड स्थिर नहीं है, बल्कि ये लगातार फैल रहा है। स्थिर ब्रह्मांड ही आइंस्टीन के जनरल रिलेटिविटी सिद्धांत का आधार था, जिसे साबित करने के लिए उन्होंने गणितीय समीकरणों में कॉस्मोलॉजिकल कॉन्सटेंट का सहारा भी लिया था, लेकिन हब्बल रेडशिफ्ट प्रयोग से वो गलत साबित हो गया। आइंस्टीन ने इसे अपनी सबसे बड़ी भूल करार दिया और उन्हें जनरल रिलेटिविटी सिद्धांत में कुछ सुधार भी करने पड़े। 
अब चर्चा उसकी जो प्रो. हॉकिंग कह रहे हैं। ब्लैकहोल सबकुछ निगल लेता है, यहां तक कि बेहद करीब आ जाने वाली इन्फॉर्मेशन को भी। लेकिन 1975 में प्रो. हॉकिंग के साथ काम करते हुए इस्राइली फिजिसिस्ट जैकब बेकेन्सटाइन ने दिखाया कि ब्लैकहोल्स बड़े आहिस्ता के साथ रेडिएशन छोड़ते हैं, जिससे वो वाष्पीकृत होकर बाद में खत्म हो जाते हैं। फिर, उस इन्फॉर्मेशन का क्या होता है, जिसे ब्लैकहोल निगल जाते हैं ? प्रो. हॉकिंग दसियों साल से ये तर्क देते रहे थे कि ब्लैकहोल में जाकर इन्फॉर्मेशन नष्ट हो जाती है। लेकिन निरंतरता के विचार (ideas of continuity) और कार्य-कारण सिद्धांत के लिए प्रो. हॉकिंग का ये तर्क हमेशा एक एक बड़ी चुनौती बना हुआ था। 1997 में जुआन माल्डासीना ने एंटी डे-सिटर/ कन्फर्मल फील्ड थ्योरी करेस्पान्डेंस (Anti-de-Sitter/conformal field theory correspondence) या AdS/CFT के नाम से एक गणितीय शॉर्टकट विकसित किया। इस शॉर्टकट ने किसी ब्लैकहोल जैसी स्पेस-टाइम ज्यामेट्री को उस स्पेस बाउंड्री से सरल फिजिक्स के साथ संबंधित कर दिया। प्रो. स्टीफन हॉकिंग को अब अपनी अवधारणा बदलनी पड़ी और 2004 में AdS/CFT नाम के इसी गणितीय शॉर्टकट का इस्तेमाल करके उन्होंने ये दिखाया कि किस तरह इवेंट होराइजन के मुहाने या क्वांटम-मैकेनिकल विक्षोभ के जरिए किस तरह इन्फॉर्मेशन ब्लैकहोल से लीक होकर हमारी दुनिया में वापस आ जाती है। इस भूलसुधार की वजह से प्रो. स्टीफन हॉकिंग वो मशहूर शर्त हार गए जो उन्होंने अपने मित्र वैज्ञानिक जॉन प्रेसकिल के साथ करीब 10 साल पहले लगाई थी।
सवाल वो ऐसी कौन सी खोज है, जिससी वजह से ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ में सबसे ज्यादा क्रांतिकारी बदलाव आया है?
प्रो. हॉकिंग अब तक ज्ञात मूलभूत कणों के लिए सुपरसिमिट्रिक पार्टनर्स की खोज, जो कि संभवत: लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर में हुई है। ये खोज मशहूर एम-थ्योरी के हक में सबसे मजबूत सबूत पेश करती है।
संपादक जिनेवा की अंडरग्राउंड हाई इनर्जी पार्टिकिल फिजिक्स लैब सेर्न के खास पार्टिकिल कोलाइडरलॉर्ज हैड्रॉन कोलाइडर का प्रमुख लक्ष्य है सुपरसिमिट्रिक पार्टिकिल्स की खोज। हिग्स-बोसॉन की खोज के साथ ही पार्टिकिल फिजिक्स का स्टैंडर्ड मॉडल भी पूरा हो जाएगा। लेकिन अगर सभी ज्ञात आधारभूत कणों (elementary particles) का कोई भारी-भरकम सुपरपार्टनर भी है, तो हमें कई सारी समस्याओं का हल तलाशना होगा। सुपरसिमिट्री के सबूत एम-थ्योरी के पक्ष में हैं। आइए अब एक-एक करके इन साइंस टर्म्स को समझें।
एम-थ्योरीथ्योरेटिकल फिजिक्स में एम-थ्योरी स्ट्रिंग थ्योरी का ही एक विस्तार है, जिसमें अब तक 11-डायमेंशन्स की पहचान की जा चुकी है। इस थ्योरी में एम का मतलब मेंबरेन है, नोबेल विजेता फिजिसिस्ट मिशियो काकू एम को मदर कहते हैं।
सुपर पार्टनर्स पार्टिकिल फिजिक्स में सुपरपार्टनर्स सैद्धांतिक एलीमेंट्री पार्टिकिल्स या मूलभूत कण हैं। मौजूद हाई इनर्जी फिजिक्स में सुपरसिमिट्री एक ऐसा सिद्धांत है जो हिग्स-बोसॉन या गॉड पार्टिकिल्स जैसे शैडो पार्टिकिल्स की संभावना पर जोर देता है। 
सुपरसिमिट्री पार्टिकिल फिजिक्स में सुपरसिमिट्री को सूसी भी कहते हैं। सुपरसिमिट्री एक स्पिन वाले मूलभूत कणों को आधे यूनिट के स्पिन वाले दूसरे कणों के साथ संबंधित करती है, और इस तरह के संबंध वाले कणों को सुपरपार्टनर्स कहते हैं।
एलीमेंट्री पार्टिकिल्स पार्टिकिल फिजिक्स में एलीमेंट्री पार्टिकिल्स या मूलभूत कण उन्हें कहा जाता है जो खुद से छोटे कणों से नहीं बनते। यानि उनका कोई भीतरी सबस्ट्रक्चर नहीं होता। इसलिए ऐसे एलीमेंट्री पार्टिकिल्स जिनका कोई सबस्ट्रक्चर नहीं होता, उन्हें ब्रह्मांड का निर्माता माना जाता है। ये एलीमेंट्री पार्टिकिल्स वो ईंटें हैं जिनसे संपूर्ण ब्रह्मांड और सभी ज्ञात तत्वों के कणों का निर्माण हुआ है।
सुपरसिमिट्री के सबूत सीधे-सीधे एम-थ्योरी यानि 11-डायमेंशनल स्ट्रिंग थ्योरी का समर्थन करते हैं। थ्योरी आफ एवरीथिंग के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा भी यही है।
सवाल अगर आप वर्तमान में एक युवा फिजिसिस्ट होते, जो अब अपनी शुरुआत कर रहा है, तो आप क्या पढ़ते?
प्रो. हॉकिंग तो मेरे पास एक नया विचार होता, जिससे एक नए क्षेत्र के दरवाजे खुलते

सवाल दिन के वक्त आप ज्यादातर क्या सोंचते रहते हैं?

प्रो. हॉकिंग महिलाएं, वो अपने आप में एक संपूर्ण रहस्य हैं

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012


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